उत्तर प्रदेश

Hardoi में इंसाफ की जंग: तीन साल बाद भी मूकबधिर और नेत्रहीन किशोरी के बयान नहीं हो पाए, विशेषज्ञों ने भी जताई असमर्थता

उत्तर प्रदेश के Hardoi जिले में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरे न्यायिक सिस्टम की कार्यप्रणाली और संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। तीन साल पहले हुई एक मूकबधिर और नेत्रहीन किशोरी (15) के साथ दुष्कर्म की घटना अब भी अधूरी जांच और अधूरे बयान की वजह से न्याय की मंज़िल तक नहीं पहुंच पाई है।
घटना 12 सितंबर 2022 की सुबह की है, जब किशोरी अपने गांव में शौच के लिए जा रही थी। तभी कासिमपुर थाना क्षेत्र के नंदाखेड़ा निवासी नरेश कश्यप ने उसे एक बाग से तिल्ली के खेत में खींच लिया और वहीं दुष्कर्म किया।


बयान न होने से थमी न्याय की प्रक्रिया

किशोरी के पिता की तहरीर पर मुकदमा दर्ज तो हुआ, लेकिन इसके बाद पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी — पीड़िता के बयान दर्ज कराना। चूंकि पीड़िता मूकबधिर और नेत्रहीन दोनों थी, इसलिए धारा 161 और 164 CrPC के तहत बयान संभव नहीं हो पाए।
पुलिस ने आरोपी को घटना के दो दिन बाद ही गिरफ्तार कर लिया, लेकिन बिना बयान के जेल भेजना मुश्किल था।
अंततः 12 नवंबर 2022 को परिजनों के बयान लेकर आरोपी को जेल भेजा गया। लेकिन अब तक, यानी 2025 में भी, किशोरी का न्यायालय के समक्ष बयान नहीं कराया जा सका है।


विशेषज्ञों ने एक-एक कर खड़े किए हाथ

पुलिस और न्यायालय ने हर संभव प्रयास किए कि किसी तरह किशोरी का बयान दर्ज कराया जा सके।
बाल कल्याण समिति के आदेश पर बीएसए (Basic Shiksha Adhikari) ने विशेष प्रशिक्षक क्षमा मिश्रा को लगाया। उन्होंने संकेतों के माध्यम से किशोरी से बात करने का प्रयास किया लेकिन कहा कि “वह केवल उन मूकबधिरों से संवाद कर सकती हैं जिन्हें दिखाई देता हो।”
इसके बाद पुलिस ने डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय (लखनऊ) से भी सहायता मांगी। लेकिन वहां से साफ जवाब मिला कि “नेत्रहीन और श्रवण बाधित व्यक्तियों के लिए कोई विशेष विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं है।”


एटा, बस्ती, उन्नाव और चेन्नई तक पहुंची कोशिशें

अतरौली के तत्कालीन प्रभारी निरीक्षक ने एटा के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को पत्र भेजा। प्रशांत पांडेय और गौरव मिश्रा जैसे विशेषज्ञों ने कोशिश की, पर वे भी बयान दर्ज नहीं करा सके।
चेतना स्कूल, लखनऊ को भी 18 अक्तूबर 2022 को पत्र भेजा गया। वहां के अधिकारियों ने भी असमर्थता जताई कि “वे ऐसे संकेत नहीं समझ सकते।”
फिर 26 नवंबर 2022 को बेसिक शिक्षा निदेशक को पत्र भेजा गया कि “किशोरी के बयान के लिए एटा, बस्ती और उन्नाव भेजा जा चुका है, लेकिन कोई मदद नहीं मिल सकी।”
इसके बाद 30 नवंबर 2022 को राजकीय संकेत विद्यालय को पत्र गया, लेकिन वहां से भी वही जवाब — “संकेत समझ पाना संभव नहीं।”


2023 में भी जारी रही जद्दोजहद

27 जून 2023 को दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग को पत्र भेजा गया। यहां से भी जवाब आया कि वे ऐसे मामले में मदद करने में अक्षम हैं।
18 सितंबर 2023 को किशोरी को राष्ट्रीय दृष्टिबाधित संस्थान, देहरादून भेजा गया। वहां भी बयान दर्ज कराने की कोशिश हुई, लेकिन 22 सितंबर को रिपोर्ट आई — “कोई परिणाम नहीं।”
आखिरी उम्मीद राष्ट्रीय बहु दिव्यांगता जन सशक्तिकरण संस्थान, चेन्नई से थी। 11 अक्तूबर 2023 को यहां पत्र भेजा गया। संस्थान ने जवाब में 8 जनवरी 2024 को दो विशेषज्ञों — हिमांशु और नीरज — के नाम दिए। लेकिन इन दोनों ने भी कहा कि “ऐसा व्यक्ति ही मदद कर सकता है जिसने बहु दिव्यांगता की भाषा का डिप्लोमा किया हो।”


पुलिस ने देशभर में ढूंढे विशेषज्ञ, नहीं मिला कोई योग्य व्यक्ति

पुलिस ने पूरे प्रदेश और अन्य राज्यों में भी ऐसे विशेषज्ञों की तलाश की, जो Deaf-Blind Language Communication में प्रशिक्षित हों। लेकिन भारत में ऐसे विशेषज्ञों की संख्या नगण्य है।
कानून व्यवस्था के तहत धारा 161 (पुलिस के समक्ष बयान) और धारा 164 (न्यायिक बयान) अत्यंत आवश्यक होते हैं। इनकी अनुपस्थिति में न केवल चार्जशीट कमजोर होती है, बल्कि पूरा मामला परिस्थिति जन्य साक्ष्यों (circumstantial evidence) पर टिक जाता है।


15 गवाहों में से 6 की गवाही पूरी, पर पीड़िता की आवाज़ अब भी गुम

मामले में कुल 15 गवाह हैं, जिनमें से अब तक 6 की गवाही हो चुकी है
शेष गवाहों के बयान और दस्तावेजी साक्ष्य के आधार पर ही अदालत में सुनवाई जारी है।
लेकिन न्यायिक प्रक्रिया का मूल — पीड़िता का स्वयं का बयान — अब तक अधूरा है। यह भारतीय न्याय प्रणाली के लिए गहरी चिंता का विषय बन चुका है।


कानूनी विशेषज्ञों ने क्या कहा?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक अपराध का नहीं, बल्कि न्यायिक संरचना की सीमाओं का उदाहरण है।
वरिष्ठ अधिवक्ता अमित श्रीवास्तव कहते हैं, “ऐसे मामलों में सरकार को विशेष भाषा विशेषज्ञों की नियुक्ति करनी चाहिए, ताकि दिव्यांग पीड़ितों के बयान दर्ज किए जा सकें।”
वहीं महिला अधिकार कार्यकर्ता सुजाता द्विवेदी का कहना है कि “तीन साल से अधिक का समय बीत जाने के बावजूद जब पीड़िता का बयान नहीं हो पा रहा, तो यह संवैधानिक अधिकारों का भी उल्लंघन है।”


दिव्यांगता और न्याय — नीति बनाम वास्तविकता

भारत में Persons with Disabilities Act 2016 और Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act जैसे कानून स्पष्ट रूप से दिव्यांग पीड़ितों के लिए न्यायिक सहायता की गारंटी देते हैं।
लेकिन Hardoi केस दिखाता है कि व्यवहार में यह गारंटी सिर्फ कागजों तक सीमित है।
राज्य सरकारों और केंद्र को मिलकर ऐसे मामलों के लिए बहु दिव्यांग भाषा विशेषज्ञों की एक राष्ट्रीय सूची तैयार करनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई बच्ची या बच्चा इस तरह न्याय से वंचित न रह जाए।


परिवार की पीड़ा और समाज की जिम्मेदारी

किशोरी के पिता कहते हैं, “हमारी बेटी तो कुछ कह नहीं सकती, पर उसकी आंखों में दर्द साफ झलकता है। पुलिस कोशिश कर रही है, पर कोई सुनने वाला नहीं।”
गांव के लोगों ने भी प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई है। उनका कहना है कि “अगर इतने सालों में भी ऐसे मामलों में कोई समाधान नहीं निकला, तो समाज में दिव्यांगों का विश्वास कैसे बनेगा?”


सिस्टम की संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल

यह मामला न केवल पुलिस या अदालत की दिक्कत है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की संवेदनशीलता की परीक्षा है।
हर कोशिश, हर पत्राचार और हर जवाब सिर्फ यही कह रहा है — “हम असमर्थ हैं।”
लेकिन सवाल यह है कि क्या न्याय व्यवस्था किसी व्यक्ति की शारीरिक सीमाओं के कारण ठहर जानी चाहिए?


न्याय की उम्मीद अभी बाकी है

तीन साल बीत चुके हैं। आरोपी जेल में है, सुनवाई चल रही है, लेकिन पीड़िता की “बोलती चुप्पी” अब भी अनसुनी है।
शायद भारत की न्याय प्रणाली को अब यह सोचने की जरूरत है कि न्याय सिर्फ कानों से नहीं, संवेदना से भी सुनना चाहिए।


**Hardoi का यह मामला पूरे देश के लिए एक सीख है।** दिव्यांग पीड़ितों के लिए न्याय सिर्फ अदालतों का विषय नहीं, बल्कि मानवता का सवाल है। अब वक्त है कि सरकार और समाज मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाए, जो हर आवाज़ — चाहे वह सुनाई दे या नहीं — न्याय तक पहुंच सके।

 

News-Desk

News Desk एक समर्पित टीम है, जिसका उद्देश्य उन खबरों को सामने लाना है जो मुख्यधारा के मीडिया में अक्सर नजरअंदाज हो जाती हैं। हम निष्पक्षता, सटीकता, और पारदर्शिता के साथ समाचारों को प्रस्तुत करते हैं, ताकि पाठकों को हर महत्वपूर्ण विषय पर सटीक जानकारी मिल सके। आपके विश्वास के साथ, हम खबरों को बिना किसी पूर्वाग्रह के आप तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। किसी भी सवाल या जानकारी के लिए, हमें संपर्क करें: info@poojanews.com

News-Desk has 21325 posts and counting. See all posts by News-Desk

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

13 − eleven =