Iran पर दो हफ्ते से हमले, फिर भी सत्ता मजबूत! अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, जंग खत्म करने के संकेत
Iran War News इन दिनों वैश्विक राजनीति और सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए बड़ा मुद्दा बना हुआ है। अमेरिका और इजराइल पिछले लगभग दो सप्ताह से ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों पर लगातार एयरस्ट्राइक कर रहे हैं। इन हमलों का उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना और उसके परमाणु कार्यक्रम से जुड़े ढांचे को नुकसान पहुंचाना बताया जा रहा है।
हालांकि ताजा अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों में यह संकेत मिला है कि इतने हमलों के बावजूद ईरान की मौजूदा सत्ता अभी भी काफी मजबूत स्थिति में है और उसके जल्द गिरने की संभावना फिलहाल नजर नहीं आ रही है। इस मामले से जुड़े तीन सूत्रों ने अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स को जानकारी देते हुए बताया कि खुफिया एजेंसियों के कई आकलन इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं।
सूत्रों के अनुसार, ईरान की सरकार अभी भी देश के अंदर प्रशासनिक और राजनीतिक नियंत्रण बनाए हुए है, जबकि बाहरी दबाव के बावजूद उसकी संस्थाएं सक्रिय रूप से काम कर रही हैं।
ईरान की सत्ता पर खतरा फिलहाल नहीं
ताजा खुफिया आकलनों में कहा गया है कि लगातार हो रहे हवाई हमलों के बावजूद ईरान की मौजूदा सत्ता व्यवस्था टूटने की स्थिति में नहीं है।
एक खुफिया सूत्र के मुताबिक कई अलग-अलग रिपोर्टों में समान निष्कर्ष सामने आए हैं कि ईरान की सरकार अभी भी जनता और प्रशासनिक तंत्र पर नियंत्रण बनाए रखने में सक्षम है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की राजनीतिक संरचना केवल एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं है, बल्कि इसमें धार्मिक नेतृत्व, सैन्य संस्थाएं और कई अन्य शक्तिशाली संस्थान शामिल हैं, जो मिलकर शासन प्रणाली को चलाते हैं।
तेल की कीमतों से बढ़ रहा वैश्विक दबाव
ईरान पर जारी हमलों के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और कई देशों की राजनीति पर दबाव बढ़ रहा है।
इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने संकेत दिया है कि अमेरिका इस युद्ध को जल्द समाप्त करने की दिशा में कदम उठा सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ईरान की कट्टरपंथी नेतृत्व व्यवस्था सत्ता में बनी रहती है तो युद्ध समाप्त करने का रास्ता आसान नहीं होगा।
खामेनेई की मौत के बाद भी कायम है सत्ता का ढांचा
खुफिया रिपोर्टों में एक महत्वपूर्ण दावा यह भी सामने आया है कि 28 फरवरी को हमलों के पहले दिन ही ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी।
इसके बावजूद वहां की धार्मिक नेतृत्व वाली व्यवस्था पूरी तरह बिखरी नहीं है। बल्कि सत्ता के भीतर मौजूद नेतृत्व प्रणाली ने तेजी से नए ढांचे के तहत काम करना शुरू कर दिया।
इजराइल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी रॉयटर्स से बातचीत में कहा कि कई गुप्त बैठकों में यह आकलन सामने आया है कि ईरान की सरकार फिलहाल गिरने की स्थिति में नहीं है।
ईरान की सैन्य और राजनीतिक संरचना मजबूत
अमेरिका और इजराइल के हमलों में ईरान के कई महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाया गया है। इनमें एयर डिफेंस सिस्टम, परमाणु प्रतिष्ठान और शीर्ष नेतृत्व से जुड़े लोग शामिल हैं।
इन हमलों में कई वरिष्ठ अधिकारी और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कई बड़े कमांडर भी मारे गए हैं। IRGC ईरान की एक शक्तिशाली सैन्य और अर्धसैनिक संस्था है जो देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
फिर भी अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों का कहना है कि इन हमलों के बावजूद ईरान की आंतरिक नेतृत्व व्यवस्था अभी भी सक्रिय है और देश पर नियंत्रण बनाए हुए है।
विशेषज्ञों का आकलन
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की विशेषज्ञ सुजैन मलोनी ने कहा कि ईरान के अंदर फिलहाल ऐसी कोई बड़ी ताकत नजर नहीं आती जो सरकार के पास मौजूद शक्ति को चुनौती दे सके।
उनका कहना है कि ईरान भले ही बाहरी मोर्चों पर सीमित प्रतिक्रिया दे रहा हो, लेकिन देश के अंदर उसकी पकड़ अभी भी मजबूत है।
तेहरान में हाल ही में एक बिलबोर्ड लगाया गया है जिसमें ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई को देश का झंडा अपने बेटे और संभावित उत्तराधिकारी मुजतबा खामेनेई को सौंपते हुए दिखाया गया है। इस तस्वीर में इस्लामी क्रांति के संस्थापक अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी की तस्वीर भी दिखाई देती है।
मुजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता घोषित किया गया
हाल ही में ईरान के वरिष्ठ शिया धर्मगुरुओं की संस्था असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ने अयातुल्ला खामेनेई के बेटे मुजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता घोषित कर दिया है।
इस फैसले के बाद ईरान की सत्ता संरचना में निरंतरता बनाए रखने का संकेत मिला है। हालांकि यह भी माना जा रहा है कि आने वाले समय में ईरान की आंतरिक राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं।
क्या ईरान में जमीनी युद्ध होगा?
सूत्रों के मुताबिक यदि अमेरिका और इजराइल का उद्देश्य ईरान की मौजूदा सरकार को पूरी तरह समाप्त करना है, तो इसके लिए केवल हवाई हमले पर्याप्त नहीं होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लिए संभवतः जमीनी सैन्य कार्रवाई करनी पड़ सकती है। इससे ईरान के भीतर विरोध प्रदर्शन बढ़ सकते हैं और सत्ता पर दबाव बन सकता है।
ट्रम्प प्रशासन ने फिलहाल ईरान में अमेरिकी सैनिक भेजने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है, हालांकि इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
कुर्द मिलिशिया समूहों की सक्रियता
इसी बीच खबरें सामने आई हैं कि इराक में मौजूद कुछ ईरानी कुर्द मिलिशिया समूहों ने अमेरिका से संपर्क किया है। इन समूहों ने प्रस्ताव दिया है कि यदि उन्हें समर्थन दिया जाए तो वे पश्चिमी ईरान में सुरक्षा बलों पर हमला कर सकते हैं।
ईरानी कुर्दिस्तान की कोमाला पार्टी के प्रमुख अब्दुल्ला मोहतदी ने कहा कि यदि अमेरिका समर्थन दे तो हजारों युवा सरकार के खिलाफ हथियार उठाने के लिए तैयार हैं।
उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ क्षेत्रों में सुरक्षा बलों ने ठिकाने खाली कर दिए हैं क्योंकि उन्हें अमेरिका और इजराइल के हमलों का डर है।
कुर्द लड़ाकों की क्षमता पर संदेह
हालांकि अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों में यह आशंका भी जताई गई है कि ईरानी कुर्द समूह लंबे समय तक सुरक्षा बलों का सामना करने में सक्षम नहीं होंगे।
सूत्रों के अनुसार उनके पास न तो पर्याप्त हथियार हैं और न ही पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित लड़ाके।
हाल के दिनों में इन समूहों ने वॉशिंगटन में अमेरिकी अधिकारियों से हथियार और बख्तरबंद वाहनों की मांग भी की है। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने फिलहाल उन्हें समर्थन देने का प्रस्ताव ठुकरा दिया है।
ईरान की सत्ता को गिराना आसान नहीं
वॉशिंगटन पोस्ट की एक अलग रिपोर्ट में भी यही कहा गया है कि भले ही अमेरिका ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमला करे, फिर भी वहां की मौजूदा सत्ता को गिराना आसान नहीं होगा।
यह आकलन नेशनल इंटेलिजेंस काउंसिल (NIC) की एक गुप्त रिपोर्ट में किया गया है। यह संस्था अमेरिका की 18 खुफिया एजेंसियों के वरिष्ठ विशेषज्ञों का समूह है जो सुरक्षा से जुड़े रणनीतिक आकलन तैयार करता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान की सैन्य और धार्मिक नेतृत्व वाली व्यवस्था इतनी मजबूत है कि उसे पूरी तरह हटाना बेहद कठिन होगा।
मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव
ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव तेजी से बढ़ गया है। इस संघर्ष में ईरान, इजराइल, सऊदी अरब, लेबनान और संयुक्त अरब अमीरात समेत कई देश सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहे हैं।
बताया जा रहा है कि क्षेत्र के करीब 12 देश इस संकट से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। हालांकि दिलचस्प बात यह है कि नौ दिन बीत जाने के बाद भी यमन के हूती विद्रोही अब तक इस संघर्ष में सीधे तौर पर शामिल नहीं हुए हैं।

