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Khatauli में में गूंजा प्रभु का नाम: शांतिनाथ विधान, भव्य आरती, और आत्मा से सिद्धत्व की ओर की मंत्रमुग्ध प्रस्तुति ने मोहा जनमानस

Khatauli  की पवित्र भूमि पर श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, जैन मंडी के तत्वावधान में चल रहे पंचदिवसीय भगवान महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव के चौथे दिन का आयोजन भक्ति, संस्कृति और आत्मिक शांति की त्रिवेणी में तब्दील हो गया। कार्यक्रम की हर एक गतिविधि ने श्रद्धालुओं के हृदय को छू लिया और एक दिव्य अनुभव प्रदान किया।

शांतिनाथ विधान और जलाभिषेक से हुई शुरुआत

प्रातः कालीन नित्य पूजन के पश्चात, नितिन भैय्या जी के कुशल निर्देशन में भगवान शांतिनाथ विधान का आयोजन किया गया, जो संपूर्ण ब्रह्मांड में शांति की कामना का प्रतीक है। इस विधान के मुख्य पुण्यार्जक अरुण कुमार जैन ‘महलके वाले’ रहे। विधिपूर्वक संपन्न इस विधान में जलाभिषेक, शांतिधारा और विशेष पूजन हुआ।

इस विधान का धार्मिक महत्व अत्यधिक है। आचार्य श्री भारत भूषण जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा, “शांतिनाथ भगवान के काल से लेकर आज तक धर्म की अखंड धारा प्रवाहित होती रही है। जब तक जीव अपने जीवन से हिंसा, चोरी, कुशील, झूठ और परिग्रह का त्याग नहीं करता, तब तक चिरशांति की प्राप्ति संभव नहीं।”

वात्सल्य भोज और सांस्कृतिक प्रस्तुति बनी विशेष आकर्षण

विधान के उपरांत, श्रद्धालुओं के लिए वात्सल्य भोज का आयोजन किया गया, जिसकी जिम्मेदारी अंजलि जैन, मातेश्वरी शशांक जैन परिवार ने उठाई। गर्मागर्म प्रसाद और भक्ति भाव से ओतप्रोत वातावरण ने श्रद्धालुओं को गहराई से छू लिया।

दोपहर के सत्र में उत्सव पंडाल में एक अनूठा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुआ। श्री दिगम्बर जैन महासमिति महिला इकाई द्वारा प्रस्तुत जैन धर्म पर आधारित पहेलियों ने न केवल मनोरंजन किया, बल्कि ज्ञानवर्धन भी किया। विजेताओं को आकर्षक पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया।

शोभायात्रा में गूंजे प्रभु के नाम, दीपों की आरती ने किया मंत्रमुग्ध

संध्या आरती से पहले शहर की गलियों में भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें प्रभु का गुणगान करते हुए श्रद्धालु उत्सव पंडाल तक पहुँचे। यह शोभायात्रा टीकमगढ़ से आए विशेष जैन बैंड के साथ निकाली गई। आयोजन की अगुवाई अनिल जैन, पुलकित जैन बसेडे परिवार ने की।

पंडाल पहुंचकर दीपों के साथ भक्ति नृत्यपूर्वक आरती हुई। इस सजीव दृश्य ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। नितिन भैय्या जी ने अपने प्रवचन में कहा, “हम जैसे अपने रिश्तेदारों का परिचय प्राप्त करते हैं, वैसे ही परमात्मा का भी परिचय लेना चाहिए। यही आत्मा का कल्याण है।”

आत्मा से सिद्धत्व की ओर – एक अविस्मरणीय नृत्य नाटिका

रात्रिकालीन सत्र में हुआ एक विशेष आयोजन, जिसने सभी का मन मोह लिया। आचार्य विद्यासागर जी महाराज की सुशिष्या आर्यिका माता पूर्णमति द्वारा विरचित नृत्य नाटिका ‘आत्मा से सिद्धत्व की ओर’ का मंचन अरुण जैन और अंजू जैन द्वारा प्रस्तुत किया गया। इस दिव्य प्रस्तुति में आत्मा की यात्रा, उसके कर्मबंधन और मोक्ष की ओर अग्रसर होने की गाथा को अत्यंत मार्मिक तरीके से दर्शाया गया।

प्रस्तुति इतनी प्रभावशाली थी कि दर्शकों की आंखें नम हो गईं। धर्म और अध्यात्म का ऐसा जीवंत संयोजन आधुनिक समय में दुर्लभ होता जा रहा है।

रात में गरम दूध सेवा और आयोजन समिति का अद्वितीय सहयोग

रात्रि में जिन शासन प्रभावना संघ के युवाओं द्वारा श्रद्धालुओं को गरम दूध वितरित किया गया, जो इस आयोजन की सेवा भावना का प्रतीक बना। एक तरफ शांति और भक्ति की अनुभूति, तो दूसरी तरफ सेवा का ऐसा भावपूर्ण उदाहरण, यही जैन धर्म की असली पहचान है।

श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति और आयोजन में जुटे समर्पित चेहरे

इस महोत्सव में हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। प्रमुख रूप से उपस्थित श्रद्धालुओं में:
सुभाष जैन, राजेन्द्र जैन, सुशील जैन, हंस कुमार जैन, सुनील जैन, प्रदीप जैन, बालेश्वर जैन, संजय जैन (दादरी), अरुण जैन, नीरज जैन, मुकेश आढ़ती, मनोज आढ़ती, वैभव जैन, संजीव जैन, कुलदीप जैन, विवेक जैन, ऋषभ जैन, मुकुल जैन, अशोक जैन, प्रीति जैन, बबिता जैन, स्वाति जैन, अलका जैन, मनीषा जैन, करिश्मा जैन, वर्षा जैन, मंजू जैन, अंजू जैन आदि प्रमुख रहे।

सभी श्रद्धालुओं ने आत्मा से सिद्धत्व की ओर नाटिका की प्रशंसा करते हुए आयोजकों को धन्यवाद ज्ञापित किया।


🔮 ऐसा रहा महोत्सव का चौथा दिन: एक झलक में

  • 🌸 शांतिनाथ विधान के साथ अध्यात्मिक ऊर्जा की अनुभूति

  • 🥣 वात्सल्य भोज ने जोड़ा श्रद्धालुओं को प्रेमसूत्र में

  • 🎭 जैन धर्म पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रम में हाजिरजवाबी और धर्मज्ञान

  • 🕯️ दीपों की भव्य आरती और शोभायात्रा में उमड़ा जनसैलाब

  • 🎭 ‘आत्मा से सिद्धत्व की ओर’ ने किया भावविभोर

  • 🥛 रात्रि दूध सेवा ने सेवा की परंपरा को निभाया


खतौली की धरती इस महोत्सव के माध्यम से अध्यात्म और संस्कृति की उजासमयी मिसाल बन गई। जैन धर्म की शिक्षाएं, उसकी सांस्कृतिक गरिमा और धार्मिक अनुशासन का ऐसा जीवंत उदाहरण निश्चित ही आने वाले समय में समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।

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