स्वास्थ्य

कुष्ठ :रोग छोटा- त्रासदी बड़ी, होमियो चिकित्सा

आज से कुछ समय पहले तक श्राप या लंबे समय तक कुष्ठ रोग को पापकर्मों का फल , ईश्वर का दंड समझा जाता था एवं कुष्ठ रोगियों को अछूत मानकर कलंकित किया जाता था और उनका त्याग कर दिया जाता था . उदाहरणार्थ मध्ययुग में यूरोप में कुष्ट ग्रस्त व्यक्यिों को विशेष तरह के कपड़े पहनने होते थे 

दूसरों को यह संकेत देने के लिए घंटी बजानी पड़ती थी कि वे निकट है और हवा की दिशा के आधार पर रास्ते में विशेष तरफ चलना भी होता था .

भारत में राष्ट्रीय स्तर पर जनस्वास्थ्य समस्या के रूप में चिन्हित कर कुष्ठ रोग के उन्मूलन को अभियान चलाने एवं बहुऔषध थिरेपी की शुरूआत एवं इसकी आश्चर्यजनक सफलता ने देशभर में कुष्ठ रोगियों की संख्या में तेजी से कमी आई है और प्रति 10,000 जनसंख्या पर एक से कम की घटना दर के साथ कुष्ठ अब जनस्वास्थ्य समस्या नहीं रह गयी है 

मार्च 2010 में यह आंकड़ा 0.71 / 10,000 पर आ गया . बिहार , छत्तीसगढ़ और केन्द्र शासित प्रदेशों में इसे पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य हासिल कर लिया है .

इस तरह हम कह सकते हैं कि कुष्ठरोग रूपी सामाजिक कलंक धीरे – धीरे मिटता जा रहा है . कुष्ठ माइक्रोबैक्टिरियम लेप्रो नामक बैक्ट्रिया द्वारा उत्पन्न एक चिरकारी संक्रामक रोग है . बैक्ट्रिया के शरीर में प्रवेश करने और रोग लक्षण प्रकट होने के बीच का समय 6 माह से 1 वर्षों के बीच से सकता है . कुष्ठ . किसी भी उम्र या लिंग के व्यक्तियों को प्रभावित कर सकती है जिनमें नवजात शिशु भी शामिल है

अवस्थाएं : इस बीमारी की कई अवस्थाएं हैं , यह दूसरे लोगों में सीधे सम्पर्क द्वारा या थूकने , छींकने , खांसने से भी फैल सकती है , क्योंकि इस रोग के कीटाणु रोगी के थूक , लार आदि में बहुतायत से पाये जाते हैं . कुष्ठ रोग की पहचान के आसान तरीके कुष्ठ का पहला लक्षण प्रायः त्वचा पर उत्पन्न धब्बा है जिसका रंग आसपास की त्वचा की अपेक्षा हल्का होता है , उनका रंग लाल हो सकता है और उनका किनारा उठा हुआ भी हो सकता है .

कुष्ठ के धब्बे प्रायः धीरे – धीरे प्रकट होते हैं और कई आकारों में पाए जाते हैं . कुष्ठ के धब्बों में खुजली या दर्द नहीं होता ; बल्कि उनको स्पर्श करते समय व्यक्ति को कोई अनुभूति नहीं होती , यानि त्वचा के दाग पर संवेदना का कम होना या बिल्कुल न होना कुष्ठ रोग की ओर इशारा करती है .

कभी – कभी कुष्ठ त्वचा के मोटा होने के रूप में देखा जाता है और त्वचा पर कोई धब्बा नहीं होता , त्वचा चमकदार और छूने पर शुष्क हो सकती है , इसका रंग आसपास की त्वचा की अपेक्षा अधिक लाल हो सकता है . कभी – कभी कुष्ठ से त्वचा पर नाडयूल या सूजन भी हो सकती है जो प्रायः गंभीर संक्रमक की ओर इशारा करते हैं .

कुष्ठ रोगी को असामान्य संवेदन की अनुभूति जैसे हाथों या पैरों में सुन्नपन , झुनझुनी या जलन तथा हाथ या पैर में शक्ति की क्षीणता का एहसास हो सकता है , तंत्रिका की खराबी से हाथ तथा पैर में स्पर्श की अनुभूति नहीं होती है . अतः कुष्ठ रोगी महसूस किए बगैर अपने को घायल कर सकते हैं . इसी कारण कुष्ठ ग्रस्त लोगों को प्रायः चोट लग जाती है और अल्सर हो जाता है 

तंत्रिका की क्षति से रोगी को गंभीर अशक्तता हो सकती है जो हाथ , पैर या आंखों जैसे प्रभावित भागों में स्पर्श अनुभूति या पेशी की दुर्बलता के रूप में देखा जा सकता है , पेशी की कमजोरी यदि पलों में हो तो रोगी अपनी आंखों को नहीं बंद कर सकता है , यह खतरनाक है क्योंकि खुले रहने से आंखों को आसानी से क्षति पहुंच सकती है 

यदि बांह की तंत्रिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती है तो हाथ की पेशियां अपनी शक्ति खो देती है , इससे अंगुलियां लकवाग्रस्त हो सकती है . तंत्रिका के क्षतिग्रस्त होने से असंवेदनशीलता और शुष्कता भी उत्पन्न हो सकती है .

हाथ या पैर की अंगुलियों में स्पर्श अनुभूति खो देने वाले रोगी को उनके कहने या जलने पर दर्द का अहसास नहीं होगा जिससे दर्द रहित जख्म बन जाते हैं . यदि इन जख्मों का उपचार नहीं किया जाए तो वे बड़े और संक्रमित हो जाते हैं इससे हाथ – पैर की अंगुलियां गल जाती हैं .

पैर का बचाव न किया जाय तो पैर के तलवे में अल्सर हो सकता है , इसलिए रोगी को विशेष तरह के जूतों का प्रयोग करने की सलाह दी जाती है .

कुष्ठ के अत्यधिक बढ़ जाने पर चेहरे की त्वचा कभी – कभी मोटी हो जाती है , इससे विशेषकर नाक कर्णपालि तथा भौंह प्रभावित होती है . कुष्ठ प्रायः दर्दनाक रोग नहीं होता है किन्तु कभी – कभी कुष्टयस्त व्यक्ति दर्द एवं बेचैनी महसूस कर सकती है , इसका कारण कुष्ठ बैंसिली की उपस्थिति से तंत्रिका क्षति और अशक्तता हो सकती है . कुष्ठ अत्यन्त परिवर्तनीय रोग है जो विभिन्न लोगों को उनकी प्रतिरोधक शक्ति के अनुसार विभिन्न तरीके से प्रभावित करता है 

कुछ लोगों को हल्का संक्रमण होता है और शरीर पर पांच या अधिक धब्बे पाए जाते हैं . इस तरह के संक्रमण को पौसीबैसिलरी या पी बी कुष्ठ कहते हैं . अन्य रोगियों को अधिक गंभीर संक्रमण हो सकता है जिसकी पहचान मल्टी बैसिलरी या एम वी के रूप में की जाती है , इसमें शरीर पर पांच से अधिक धब्बे पाए जाते हैं 

आधुनिक चिकित्सा प्रणाली ( एलोपैथी ) में कुष्ठ रोग के उपचार हेतु बहु औषध थिरेपी दी जाती है जिसमें यह दावा किया जाता है कि नियमित उपचार से कुष्ठ रोग पूर्णतया साध्य है . पी.बी. कुष्ठ रोगी जो 15 वर्ष से अधिक उम्र के हैं उनको 6 माह तक एम डी टी दवा की कोर्स दी जाती है . खुराक उपचार शुरू होने ( पहला दिन ) पर ली जाती है और उसके बाद 6 माह तक प्रत्येक 28 वें दिन ली जाती है 

दैनिक खुराक 6 माह तक प्रत्येक दिन ली जाती है . एम बी कुष्ठ रोगी जो 15 वर्ष से अधिक उम्र के हैं उनको उपचार का कोर्स 12 माह तक दिया जाता है . मासिक खुराक इलाज शुरू करने ( पहला दिन ) पर भी जाती है और उसके बाद 12 माह तक प्रत्येक 28 दिन पर . दैनिक खुराक 12 माह तक प्रतिदिन दी जाती है 

बच्चों के लिए खुराक उनकी आयु के अनुसार भिन्न होती है ; किन्तु उन्हें उतनी ही समयावधि तक वह भी औषधियां अवश्य ही लेनी चाहिए जो वयस्क लेते हैं . यानि पी.बी. के लिए 6 माह तथा एम.बी. के लिए 12 माह तक . यदि कोई रोगी कुछ माह का उपचार प्राप्त करने से चूक जाता है तो भी वे इस कोर्स को तब तक जारी रख सकते हैं जब तक कि वे पी.बी. कोर्स के लिए 3 माह से अधिक या एम.बी. कोर्स के लिए 6 माह से अधिक समय का उपचार प्राप्त करने से चूक न जाते हों 

जो रोगी इससे अधिक माह तक उपचार लेने से चूक जाते और फिर भी उनमें कुष्ठ के लक्षण हों तो उन्हें पुनः शुरू से ही उपचार का पूर्ण कोर्स लेना होता है .

कुष्ठ रोग की होमियो चिकित्सा : होमियोपैथी में भी ऐसी अनेक चमत्कारिक औषधियां हैं जिनसे कुष्ठ रोग को पूर्ण रूप से ठीक किया जा सकता है . कुछ मुख्य दवाएं इस प्रकार हैं 

हाइड्रोकोटाइल एसिटिक : – कुष्ठ रोग की यह मुख्य औषधि | मानी जाती है , त्वचा बहुत मोटी हो जाती है . पहले लाल दाग होकर फूलती है , फिर घाव बनकर चमड़ छिछड़े की तरह उतरने लगता है . चमड़े पर सुन्नापन रह भी सकता है और नहीं भी .

मानसिक एवं शारीरिक दुर्बलता तथा सभी पेशियों में चोट लगने जैसा दर्द होता है . इस दवा के प्रधान लक्षण है . दवा मूल अर्क में 15-20 बूंद सुबह – शाम कुछ माह तक लेना चाहिए . 

हांगनॉन : – इस दवा का मूल अर्क कुष्ठ रोग में काफी कारगर साबित हुए हैं .

स्कूकमचक : – इस दवा का 3x विचूर्ण शक्ति में 3-4 माह तक सेवन करने कुष्ठ रोग में काफी लाभ मिलता है

पाइपर मेथिस्टिकम_ प्राचीन काल में साधु – संत इसी दवा को सोमरस के नाम से सेवन करते थे . वैसे कुष्ठ रोग जिसमें चमड़ी पर पपड़ी जैसी एक तह जमती हो और उसके हटने पर वहां एक सफेद दाग रह जाता हो और फिर घाव बन जाता हो वैसी स्थित में इस दवा को क्यू से 6 शक्ति में प्रयोग करना चाहिए . 

ऑरम मेट वैसे रोगी जिसके नाक से संडाध्र वाला बदबूदार स्त्राव निकले जो खिन्न स्वभाव का हो एवं हमेशा आत्महत्या को उतारू हो वैसे रोगियों में इस दवा से अवश्य फायदा होता है .

इसके अलावे बेसिलीन , एनाकार्डियम , ऑक्सिडेन्टालिस , ग्रेफाइटिस , गन पाउडर , आर्स आयोड , साइलेशिया आदि दवाएं भी लक्षणानुसार प्रयोग करने से बहुत लाभ होता है.

 

Drved 1 |

लेखक:

डा0 वेद प्रकाश विश्वप्रसिद्ध प्राकृतिेक एवं होमियोपैथी चिकित्सक हैं। जन सामान्य की भाषा में स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी को घर घर पहुँचा रही “रसोई चिकित्सा वर्कशाप” डा0 वेद प्रकाश की एक अनूठी पहल हैं। उनसे नम्बर 8709871868 पर सीधे सम्पर्क किया जा सकता हैं और ग्रीन स्टार फार्मा द्वारा निर्मित दवाईयाँ भी घर बैठे मंगवाई जा सकती हैं।

 

Dr. Ved Prakash

डा0 वेद प्रकाश विश्वप्रसिद्ध इलेक्ट्रो होमियोपैथी (MD), के साथ साथ प्राकृतिक एवं घरेलू चिकित्सक के रूप में जाने जाते हैं। जन सामान्य की भाषा में स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी को घर घर पहुँचा रही "समस्या आपकी- समाधान मेरा" , "रसोई चिकित्सा वर्कशाप" , "बिना दवाई के इलाज संभव है" जैसे दर्जनों व्हाट्सएप ग्रुप Dr. Ved Prakash की एक अनूठी पहल हैं। इन्होंने रात्रि 9:00 से 10:00 के बीच का जो समय रखा है वह बाहरी रोगियों की नि:शुल्क चिकित्सा परामर्श के लिए रखा है । इनका मोबाइल नंबर है- 8709871868/8051556455

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