नसबंदी के 9 साल बाद महिला बनी मां: Mahoba में चौथी संतान के जन्म से उठे सवाल, पीड़िता ने मांगी 60 हजार की क्षतिपूर्ति
Mahoba जिले से सामने आया sterilization failure case स्वास्थ्य व्यवस्था और परिवार नियोजन कार्यक्रमों की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। एक महिला, जिसने लगभग नौ वर्ष पहले सरकारी शिविर में नसबंदी कराई थी, अब चौथी बार मां बन गई। इस अप्रत्याशित घटना के बाद पीड़ित परिवार ने प्रशासन से आर्थिक सहायता की मांग की है।
महिला का कहना है कि उसने परिवार नियोजन योजना पर भरोसा करते हुए ऑपरेशन कराया था, लेकिन इसके बावजूद गर्भधारण हो जाना उसके लिए मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से बड़ी चुनौती बन गया है।
सरकारी नसबंदी शिविर के बाद भी हुआ गर्भधारण
कबरई विकासखंड के सुनेचा गांव निवासी लेखपाल वर्मा की पत्नी भागवती ने बताया कि उन्होंने 8 दिसंबर 2016 को कबरई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में नसबंदी करवाई थी। उस समय उनके तीन बच्चे थे और परिवार ने आगे संतान न होने का निर्णय लिया था।
लेकिन जुलाई 2024 में अचानक स्वास्थ्य संबंधी बदलाव महसूस होने पर जांच कराई गई तो पता चला कि वह फिर से गर्भवती हैं। यह जानकारी मिलने के बाद परिवार हैरान रह गया और स्वास्थ्य विभाग से संपर्क किया गया।
अल्ट्रासाउंड के बाद गर्भपात से किया गया इनकार
महिला के अनुसार जब वह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचीं तो जांच के बाद गर्भपात कराने की संभावना पर चर्चा हुई, लेकिन चिकित्सकों ने प्रक्रिया से इनकार कर दिया। इसके बाद गर्भ जारी रहा और 21 जनवरी 2025 को उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया।
नवजात के जन्म प्रमाणपत्र के साथ महिला ने प्रशासन को शिकायत पत्र सौंपकर मामले की जांच और सहायता की मांग की है।
आर्थिक रूप से कमजोर परिवार पर बढ़ा बोझ
भागवती ने बताया कि वह भूमिहीन और श्रमिक परिवार से संबंध रखती हैं। परिवार का भरण-पोषण मजदूरी से होता है। वह और उनके पति रोजी-रोटी की तलाश में Noida सेक्टर 49 के बरौला गांव में काम करते रहे हैं।
उनका कहना है कि नसबंदी के बावजूद संतान का जन्म होने से परिवार की आर्थिक स्थिति और अधिक कमजोर हो गई है, इसलिए सरकार से क्षतिपूर्ति मिलना उनके लिए अत्यंत आवश्यक है।
क्षतिपूर्ति के लिए प्रशासन से लगाई गुहार
महिला ने जिलाधिकारी को दिए गए शिकायती पत्र में कहा कि नसबंदी के बावजूद परिवार नियोजन का लाभ नहीं मिल सका। इसलिए उन्हें सरकारी नियमों के तहत मिलने वाली आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
उन्होंने यह भी बताया कि संबंधित विभागीय अधिकारियों के निर्देश पर आवश्यक फॉर्म भरकर जमा कर दिए गए थे, लेकिन अब तक कोई आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं हुई है।
स्वास्थ्य विभाग की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार
महिला ने बताया कि नसबंदी असफल होने की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने तत्कालीन सीएचसी अधीक्षक डॉ. राजेश वर्मा और परिवार नियोजन अधिकारी गायत्री देवी के माध्यम से आवश्यक दस्तावेज जमा कराए थे।
इसके बावजूद लंबे समय से कोई निर्णय न होने के कारण परिवार चिंता की स्थिति में है और प्रशासन से शीघ्र कार्रवाई की अपेक्षा कर रहा है।
सीएमओ ने बताया—कभी-कभी जुड़ जाते हैं ट्यूब के सिरे
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. रमाकांत चोरिहाने ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बहुत कम मामलों में नसबंदी के बाद कटे हुए ट्यूब के सिरे दोबारा जुड़ जाते हैं, जिससे गर्भधारण संभव हो जाता है।
उन्होंने बताया कि ऐसी स्थिति में भारत सरकार के परिवार नियोजन मानकों के अनुसार प्रभावित महिला को 60,000 रुपये की क्षतिपूर्ति प्रदान की जाती है।
सरकारी प्रक्रिया के तहत लखनऊ भेजी जाती है फाइल
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिए संबंधित अस्पताल में आवेदन जमा किया जाता है। इसके बाद दस्तावेजों की जांच कर फाइल लखनऊ भेजी जाती है और अनुमोदन मिलने के बाद राशि जारी की जाती है।
अधिकारियों का कहना है कि प्रक्रिया पूरी होने के बाद पात्र लाभार्थी को निर्धारित सहायता प्रदान की जाती है।
परिवार नियोजन कार्यक्रम की विश्वसनीयता पर उठे सवाल
इस घटना के बाद क्षेत्र में परिवार नियोजन सेवाओं की गुणवत्ता को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों की समय पर जांच और पारदर्शी कार्रवाई जरूरी है ताकि लोगों का भरोसा सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं पर बना रहे।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता दोनों को मजबूत बनाने की आवश्यकता भी इस घटना से उजागर होती है।
क्षतिपूर्ति मिलने की उम्मीद में प्रशासन की ओर टिकी नजरें
महिला और उनका परिवार अब प्रशासन से जल्द राहत मिलने की उम्मीद लगाए हुए हैं। उनका कहना है कि आर्थिक सहायता मिलने से नवजात के पालन-पोषण में मदद मिल सकेगी और परिवार पर बढ़ा अतिरिक्त बोझ कुछ हद तक कम होगा।

