भगवतीचरण वोहरा (Bhagwati Charan Vohra) की शहादत: इतिहास के पन्नों से
शहीद हो गए थे Bhagwati Charan Vohra
रात हो चुकी थी, सुखदेव, यशपाल अपने पास छैलबिहारी और देवराज सेठी और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन (जिसे बाद में हिंदी साहित्य में ‘अज्ञेय’ के नाम से जाना जाता है) को ईसाई कॉलेज के छात्रावास में छोड़कर शहर लौट आए। दोनों को साथ लेकर वे फिर से अंधेरे में घने जंगल में पहुंच गए। भगवती चरण (Bhagwati Charan Vohra) शहीद हो गए थे और छैलबिहारी अंधेरे में डर के मारे भाग गए थे। देखते ही देखते सभी के आंसू छलक पड़े। यशपाल ने कहा, “आइए हम उन्हें अपने बहादुर नेता के सम्मान में एक आखिरी सलामी देते हैं।” सलामी कहते ही सभी लोग एक मिनट तक सिर के पास हाथ टिका कर सेल्यूट की मुद्रा मे शव के पास खड़े रहे। भगवतीचरण महज 26 साल की उम्र में 28 मई 1930 को शहीद हो गए थे।
उनके शरीर को चादर से ढक कर सभी लोग भरी मन से अपने किराए के बंगले में लौट आए। तब तक चंद्रशेखर आजाद लौट चुके थे। घर पर छैलबिहारी, मदनगोपाल और दुर्गावती को बड़े धैर्य से घटना बताई गयी। दुर्गावती अपना मन खोलकर रो भी नहीं सकीं क्योंकि अगर शोर होता तो लोग इकट्ठा हो जाते और सभी भगोड़े क्रांतिकारियों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती। आजाद ने हमेशा की तरह घर की बत्तियां बुझा दीं। ये सभी क्रांतिकारी रात भर जागे।
प्रिय क्रांतिकारी को श्रद्धांजलि..
अगले दिन भोर से ठीक पहले, चंद्रशेखर ने बाहर निकलने के लिए कहा। इन क्रांतिकारियों के साथ साइकिल पर दुर्गावती क्रांतिकारियों की सभाओं में आतीजाती थीं, इसलिए लोग चर्चा करने लगे थे। लोगों का ध्यान न खिंचे इस सावधानी के चलते दुर्गावती इस समय अंधेरे में उनके साथ बाहर नहीं जा सकती थीं। अंत में, यशपाल, चंद्रशेखर और बच्चन जंगल के लिए निकल पड़े। शव के पास कोई जंगली जानवर नहीं पहुंचा लेकिन खून में बड़ी-बड़ी चींटियां जमा हो गईं।
उनके पास फावड़ा या कुदाल नहीं था, इसलिए शव को खोदकर दफन भी नहीं कर सकते थे। शव जलाते तो धुंए और दुर्गंध से पुलिस को खतरा है। कुछ बाल काटकर स्मृति के रूप मे रख लिया गया। अंत में कोई रास्ता न देख लाश को एक चादर मे बांधकर लाश को नदी के बहा दिया गया, लाश ऊपर तैरे नहीं इसके लिए चादर को भरी पत्थरों से भर कर पानी मे डुबा दिया गया। और भगवती चरण को जल समाधि दी गई। सभी लोग घर लौट आए और जोर-जोर से अपने प्रिय क्रांतिकारी को श्रद्धांजलि दी।
इस घटना को लेकर यशपाल आजन्म खुद को ही दोषी ठहराते रहे। भगवतीचरण की मृत्यु पर, चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि उनका दाहिना हाथ कट गया है। इसके बाद इन क्रांतिकारियों ने कई दिनों तक जेल परिसर अध्ययन किया और योजना को पुख्ता बनाया। कुछ दिनों बाद सभी बोर्स्टल जेल के बाहर तैयार हो गए, लेकिन भगत सिंह की ओर से भागने की तैयारी नहीं दिखाई पड़ी, और उनको लेकर पुलिस की गाड़ी चली गयी।
चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बाद भगत सिंह ने कहा, “हमारा तुच्छ बलिदान उस जंजीर की कड़ी है जिसका सौन्दर्य कॉमरेड भगवतीचरण वोहरा (Bhagwati Charan Vohra) के दुखद लेकिन गौरवपूर्ण बलिदान और हमारे प्रिय योद्धा आजाद की गरिमामयी मृत्यु से निखरा हुआ है”।

