परमाणु अनुसंधान रिएक्टर APSARA किया गया था 4 अगस्त को चालू..
भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जे भाभा ने 50 के दशक में कहा था कि अनुसंधान रिएक्टर परमाणु कार्यक्रम की रीढ़ की हड्डी होती हैं। इसके बाद एशिया के पहले अनुसंधान रिएक्टर “अप्सरा” APSARA का परिचालन अगस्त 1956 में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के ट्रॉम्बे परिसर में शुरू हुआ। शोधकर्ताओं को पांच दशक से अधिक समय तक समर्पित सेवा प्रदान करने के बाद इस रिएक्टर को 2009 में बंद कर दिया गया।
एशिया के पहले न्यूक्लीयर रिएक्टर को ‘अप्सरा’ कहा जाता है। यह 4 अगस्त,1956 को भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के ट्रॉम्बे परिसर में बना था। BARC की वेबसाइट के मुताबिक तत्काल पीएम पंडित जवाहरलाल नेहरू ने औपचारिक रूप से 20 जनवरी, 1957 को इसका उद्धाटन किया था।
अप्सरा के अस्तित्व में आने के लगभग 62 सालों के पश्चात 10 सितंबर 2018 को 18:41 बजे ट्रॉम्बे में स्विमिंग पूल के आकार का एक शोध रिएक्टर “अप्सरा-उन्नत” का परिचालन प्रारंभ हुआ। उच्च क्षमता वाले इस रिएक्टर की स्थापना स्वदेशी तकनीक से की गई है। इसमें निम्न परिष्कृत यूरेनियम (एलईयू) से निर्मित प्लेट के आकार का प्रकीर्णन ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है। उच्च न्यूट्रॉन प्रवाह के कारण यह रिएक्टर स्वास्थ्य अनुप्रयोग में रेडियो-आइसोटोप के स्वदेशी उत्पादन को 50 प्रतिशत तक बढ़ा देगा। इसका उपयोग नाभिकीय भौतिकी, भौतिक विज्ञान और रेडियोधर्मी आवरण के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर किया जाएगा।
इस निर्माण ने भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की क्षमता को फिर से रेखांकित किया है कि वे स्वास्थ्य देखभाल, विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में जटिल सुविधाओं वाली संरचना का निर्माण कर सकते हैं।
4 अगस्त 1956 को भारत और एशिया का पहला परमाणु अनुसंधान रिएक्टर चालू किया गया था. परमाणु अनुसंधान रिएक्टर APSARA को भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) द्वारा शुरू किया गया था. इसके डिजाइन की संकल्पना 1955 में डॉ. होमी भाभा (भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक) द्वारा की गई थी. जब रिएक्टर से नीली किरणें निकलीं तब जवाहरलाल नेहरू ने इसका नाम अप्सरा रख दिया और इसे 1957 में राष्ट्र को समर्पित कर दिया.
रिएक्टर का निर्माण यूनाइटेड किंगडम की सहायता से किया गया था जिसने प्रारंभिक ईंधन प्रदान किया था. अप्सरा एक पूल-प्रकार का रिएक्टर था और 80% शुद्ध यूरेनियम ईंधन का उपयोग करता है. इस रिएक्टर के चालू होने से भारत ने रेडियो आइसोटोप का उत्पादन शुरू कर दिया. रेडियो आइसोटोप का चिकित्सा, पाइपलाइन निरीक्षण, खाद्य संरक्षण के अलावा कई जगहों पर महत्व है.
रेडियो आइसोटोप का उपयोग कृषि में भी पाया गया है. वैज्ञानिक विकास सिमुलेशन, विकिरण के बाद भंडारण प्रभाव, प्रेरित रेडियोधर्मिता की भूमिका, न्यूट्रॉन विकिरण और रासायनिक उत्परिवर्तन के संयुक्त प्रभावों का अध्ययन करने में सक्षम हैं. इससे रोग प्रतिरोधी और अधिक उपज देने वाली फसल किस्मों को विकसित करने में काफी मदद मिली है.

