कोरोना महामारी की वजह से लगाए लॉकडाउन के कारण रूस की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर
रूस सरकार ने ये मान लिया है कि कच्चे तेल के कारोबार के अच्छे दिन गुजर चुके हैं और इसका रूस की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। जानकारों के मुताबिक इस बात की अहमियत सिर्फ रूस के लिए, बल्कि उन सभी देशों के लिए है, जिनकी अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कच्चे तेल के निर्यात पर निर्भर रही है।
रूस के उप विदेश मंत्री व्लादीमीर कोलिचेव ने एक टीवी चैनल से कहा- मुमकिन है कि कच्चे तेल के उपभोग की चरम सीमा अब गुजर चुकी हो।
इससे ये दीर्घकालिक खतरा पैदा हुआ है कि हाइड्रोकार्बन (कच्चे तेल और गैस) के निर्यात से हासिल होने वाला राजस्व उससे भी ज्यादा घट जाए, जितनी भविष्यवाणी की गई थी।
इसके पहले जारी एक रिपोर्ट में सेंट्रल बैंक ऑफ रशिया ने कहा था कि अगर कोरोना वायरस की मार दुनिया पर जारी रही, तो रूस से निर्यात होने वाले तेल की कीमत 2021 में 25 डॉलर प्रति बैरल तक गिर सकती हैं।
यह आज की कीमत की आधी होगी। इस रिपोर्ट के मुताबिक उस हाल में 2023 तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत सिर्फ 35 डॉलर प्रति बैरल तक ही पहुंच पाएगी।
पिछले महीने रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने भी कहा था कि अगले पांच साल तक दुनिया में कच्चे तेल की मांग में हर साल सिर्फ एक फीसदी की बढ़ोतरी होगी। उसके बाद ये मांग हर साल 0.1 फीसदी घटने लगेगी।
इस नए हालत के मद्देनजर रूस ने तेल से प्राप्त होने वाले राजस्व पर अपनी निर्भरता घटाने की योजना बनाई है। पुतिन ने पिछले सितंबर में कहा था कि अब तेल का राष्ट्रीय बजट में निर्णायक महत्व नहीं रहेगा। उन्होंने कहा था कि अगले साल के बजट में हाइड्रोकार्बन राजस्व का हिस्सा सिर्फ एक तिहाई रखा जाएगा।
इस साल कोरोना महामारी की वजह से लगाए लॉकडाउन के कारण दुनिया में परिवहन और औद्योगिक उत्पादन में ठहराव आ गया। इसके बाद कच्चे तेल की कीमतें इतनी गिर गईं
जितना नीचे यह पहले कभी नहीं गई थीं। इस कारण तेल उत्पादक देशों को अपने उत्पादन में भारी कटौती करनी पड़ी। कटौती के बाद बाजार में सप्लाई घटी। जिसके बाद कीमतें कुछ संभली। लेकिन इसका ओपेक (पेट्रोलियम उत्पादक देशों के संगठन) से जुड़े देशों और रूस की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा है।
ओपेक देशों के बीच इस मुद्दे पर तीखा विवाद चल रहा है कि 2021 में तेल उत्पादन का स्तर क्या रखा जाए। लेकिन कुछ खबरों के मुताबिक उनके बीच अगली जनवरी के लिए सहमति बन गई है। साल के बाकी महीनों के लिए भी मुमकिन है कि जनवरी के फॉर्मूले पर ही उत्पादन का लक्ष्य तय किया जाए।
इन खबरों के मुताबिक जनवरी में ओपेक पांच लाख बैरल कच्चे तेल का रोजाना उत्पादन बढ़ाएगा। यानी जनवरी में रोजना 77 लाख बैरल तेल का उत्पादन इस संगठन से जुड़े देश करेंगे। तय हुआ है कि जनवरी से हर महीने ओपेक की बैठक होगी, जिसमें उसके अगले महीने का उत्पादन लक्ष्य किया जाएगा।
इस समझौते को ओपेक के सभी देशों के लिए फायदेमंद बताया गया है, लेकिन विश्व मीडिया में छपी रिपोर्टों के मुताबिक कई देश उत्पादन बढ़ाने के फैसले से सहमत नहीं थे।
उन्हें अंदेशा है कि इससे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल का भाव गिरेगा और उसका नुकसान उन्हें सहना होगा। रूसी मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक जो पांच लाख बैरल उत्पादन रोज बढ़ेगा, उसमें रूस का हिस्सा सवा लाख बैरल होगा।

