संपादकीय विशेष

जानसठ में आग से पहले जागेगा Muzaffarnagar प्रशासन या हादसे के बाद? रिहायशी इलाकों में ज्वलनशील किताबों के गोदाम बने बड़ा खतरा

जानसठ। Muzaffarnagar राजधानी लखनऊ में हाल ही में हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। कई परिवारों ने अपनों को खोया, करोड़ों की संपत्ति राख हो गई और एक बार फिर यह सवाल खड़ा हुआ कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी आखिर कब तक चलती रहेगी। लेकिन लगता है कि कुछ जगहों पर ऐसी घटनाएं केवल कुछ दिनों की चर्चा बनकर रह जाती हैं। समय गुजरते ही सब कुछ पहले जैसा हो जाता है—न निरीक्षण, न कार्रवाई और न ही कोई जवाबदेही।

जानसठ कस्बे की स्थिति भी कुछ ऐसे ही सवाल खड़े करती है।


रिहायशी इलाकों में ज्वलनशील सामग्री के गोदाम, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था नदारद

कस्बे के कई घनी आबादी वाले मोहल्लों में बड़े पैमाने पर किताबों के गोदाम संचालित किए जा रहे हैं। पहली नजर में किताबों का गोदाम सामान्य लग सकता है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार कागज, गत्ता, पैकिंग सामग्री और छपाई में प्रयुक्त स्याही अत्यधिक ज्वलनशील होती है। यदि किसी कारणवश आग लग जाए तो वह कुछ ही मिनटों में विकराल रूप धारण कर सकती है।

सबसे गंभीर चिंता की बात यह है कि स्थानीय लोगों के अनुसार अनेक स्थानों पर फायर एक्सटिंग्विशर (अग्निशमन यंत्र) तक उपलब्ध नहीं हैं। यानी यदि आग की शुरुआत होती भी है तो शुरुआती स्तर पर उसे नियंत्रित करने की व्यवस्था तक मौजूद नहीं दिखाई देती।


सवाल केवल गोदामों का नहीं, आसपास रहने वाले परिवारों का भी है

इन गोदामों के आसपास बड़ी संख्या में परिवार रहते हैं। बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं ऐसे रिहायशी क्षेत्रों में अपना दैनिक जीवन बिताते हैं। यदि कभी आग लगती है तो उसका खतरा केवल गोदाम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आसपास के दर्जनों मकानों तक फैल सकता है।

संकरी गलियां स्थिति को और गंभीर बना सकती हैं। यदि दमकल वाहन समय पर घटनास्थल तक नहीं पहुंच सके तो नुकसान की कल्पना करना भी कठिन है।


क्या फायर एनओसी और सुरक्षा मानकों की नियमित जांच होती है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें यह जानकारी नहीं है कि इन गोदामों के पास फायर विभाग की अनापत्ति प्रमाणपत्र (Fire NOC) है या नहीं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन नियमित रूप से किया जा रहा है या नहीं।

यहां यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि किसी भी प्रतिष्ठान के नियमों का पालन हुआ है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय संबंधित विभागीय जांच के बाद ही किया जा सकता है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि संबंधित विभाग निष्पक्ष निरीक्षण कर स्थिति स्पष्ट करे।


नियम क्या कहते हैं और जमीन पर क्या दिख रहा है?

अग्नि सुरक्षा से जुड़े नियमों का उद्देश्य केवल कागजी औपचारिकताएं पूरी करना नहीं, बल्कि संभावित दुर्घटनाओं को रोकना होता है।

यदि किसी क्षेत्र में बड़ी मात्रा में ज्वलनशील सामग्री का भंडारण किया जा रहा है, तो वहां पर्याप्त अग्निशमन उपकरण, सुरक्षित निकास मार्ग, विद्युत सुरक्षा और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं होना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

यदि कहीं इन मानकों का पालन नहीं हो रहा है, तो संबंधित विभागों द्वारा समय रहते सुधारात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।


हादसे के बाद कार्रवाई आसान, पहले रोकथाम कठिन क्यों?

हमारे यहां अक्सर एक परिचित तस्वीर देखने को मिलती है—जब तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं होती, तब तक सब कुछ सामान्य माना जाता है। लेकिन जैसे ही हादसा होता है, जांच समितियां बनती हैं, निरीक्षण शुरू होते हैं, नोटिस जारी होते हैं और नियमों की चर्चा तेज हो जाती है।

सवाल यह है कि यदि वही निरीक्षण और सतर्कता पहले दिखाई जाए तो शायद कई हादसे होने से पहले ही रोके जा सकते हैं।


प्रशासन और संबंधित विभागों से क्या अपेक्षा है?

स्थानीय नागरिकों की मांग भी यही है कि किसी दुर्घटना का इंतजार किए बिना सभी संबंधित गोदामों का व्यापक निरीक्षण कराया जाए।

यदि सभी नियमों का पालन हो रहा है तो इससे लोगों की आशंकाएं दूर होंगी। यदि कहीं कमी पाई जाती है तो समय रहते उसे दूर कराया जा सकता है। यह कदम व्यापारियों और आम नागरिकों—दोनों के हित में होगा।


व्यापार जरूरी है, लेकिन सुरक्षा उससे भी अधिक जरूरी

यह मुद्दा किसी व्यापार या व्यवसाय का विरोध नहीं है। किताबों का व्यापार शिक्षा और समाज के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन व्यापार के साथ सुरक्षा मानकों का पालन भी उतना ही आवश्यक है।

एक छोटी सी लापरवाही कभी-कभी ऐसी त्रासदी में बदल जाती है जिसकी भरपाई वर्षों तक संभव नहीं होती। इसलिए सुरक्षा नियमों का पालन केवल कानूनी बाध्यता नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है।


अब फैसला प्रशासन के हाथ में

लखनऊ की घटना ने पूरे प्रदेश को यह संदेश दिया है कि अग्नि सुरक्षा के मामले में कोई भी लापरवाही भारी पड़ सकती है। ऐसे में जानसठ जैसे कस्बों में भी समय रहते निरीक्षण, सुरक्षा मानकों की समीक्षा और आवश्यक कार्रवाई की जरूरत महसूस की जा रही है।

स्थानीय लोगों की अपेक्षा है कि संबंधित विभाग इन चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए वास्तविक स्थिति का आकलन करें और यदि कहीं नियमों का उल्लंघन पाया जाए तो नियमानुसार आवश्यक कदम उठाएं।

कहीं ऐसा न हो कि आज जिन गलियों में लोग यह कह रहे हैं कि “यहां कुछ नहीं होगा”, वहीं कल कोई बड़ी दुर्घटना होने के बाद वही लोग पूछते नजर आएं—”निरीक्षण पहले क्यों नहीं हुआ?” प्रशासन की सबसे बड़ी सफलता किसी हादसे के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि समय रहते संभावित खतरे को पहचानकर उसे टाल देना है। उम्मीद की जानी चाहिए कि जानसठ में भी सुरक्षा व्यवस्था कागजों तक सीमित न रहकर जमीनी स्तर पर दिखाई दे।

 

Dr. S.K. Agarwal

डॉ. एस.के. अग्रवाल न्यूज नेटवर्क के मैनेजिंग एडिटर हैं। वह मीडिया योजना, समाचार प्रचार और समन्वय सहित समग्र प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है। उन्हें मीडिया, पत्रकारिता और इवेंट-मीडिया प्रबंधन के क्षेत्र में लगभग 3.5 दशकों से अधिक का व्यापक अनुभव है। वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों, चैनलों और पत्रिकाओं से जुड़े हुए हैं। संपर्क ई.मेल- drsanjaykagarwal@gmail.com

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