Bahraich में बाघ और तेंदुए का खूनी कहर! एक ही दिन दो ग्रामीणों की जान गई, 7 साल के मासूम को झाड़ियों में खींच ले गया तेंदुआ
News-Desk
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दूसरी घटना में लापता महिला की तलाश के दौरान केवल उसके पैर का हिस्सा मिला। घटनास्थल के आसपास बाघ के पदचिह्न भी पाए जाने की जानकारी सामने आई है। वन विभाग की टीम महिला के अन्य अवशेषों की तलाश और घटना की परिस्थितियों की जांच में जुटी है।
एक ही दिन में कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग के दो अलग-अलग रेंज में सामने आई इन घटनाओं के बाद जंगल से सटे गांवों में भय का माहौल है। ग्रामीण अब खेतों, जंगल की सीमा और आसपास के रास्तों पर जाने को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हैं। लोगों ने वन विभाग से हमलावर वन्यजीवों की निगरानी बढ़ाने और ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की है।
धर्मापुर रेंज में बकरियां चराने गई थी 55 वर्षीय जमिया
पहली घटना धर्मापुर रेंज की बताई जा रही है। गुजरहना गांव निवासी 55 वर्षीय जमिया शुक्रवार दोपहर करीब 2 बजे बकरियां चराने के लिए खेत की ओर गई थीं।
ग्रामीण क्षेत्रों में जंगल से सटे इलाकों में पशुओं को चराने के लिए लोग अक्सर खेतों और वन क्षेत्र की सीमा के आसपास जाते हैं। ऐसे इलाकों में वन्यजीवों की मौजूदगी का खतरा बना रहता है, खासकर जब जंगल और आबादी के बीच दूरी कम हो।
शुक्रवार को जमिया भी अपनी बकरियों को लेकर खेत की ओर गई थीं। शाम तक उनकी बकरियां वापस गांव लौट आईं, लेकिन जमिया घर नहीं पहुंचीं। बकरियों के लौट आने और महिला के नहीं आने पर परिवार के लोगों को चिंता हुई।
धीरे-धीरे आसपास के ग्रामीणों को भी जानकारी दी गई और महिला की तलाश शुरू की गई।
बकरियां लौट आईं, लेकिन जमिया का नहीं मिला पता
परिवार के लिए सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि जमिया के साथ गई बकरियां वापस घर पहुंच गई थीं, लेकिन वह खुद नहीं लौटीं। इसके बाद परिजनों और ग्रामीणों ने आसपास के खेतों, रास्तों और संभावित स्थानों पर तलाश शुरू की।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, ग्रामीणों की चिंता बढ़ती गई। शाम तक तलाश जारी रही। इसी दौरान महिला के शरीर का पैर वाला हिस्सा बरामद हुआ।
मौके के आसपास बाघ के पदचिह्न मिलने की बात भी सामने आई। इसके बाद ग्रामीणों के बीच यह आशंका मजबूत हुई कि महिला पर किसी वन्यजीव ने हमला किया हो सकता है।
हालांकि घटना की वास्तविक परिस्थितियों और हमलावर वन्यजीव की पहचान की पुष्टि वन विभाग की जांच के बाद ही हो सकेगी।
बाघ के पदचिह्न मिलने से बढ़ी आशंका
महिला के अवशेष मिलने के बाद घटनास्थल के आसपास बाघ के पदचिह्न पाए जाने की जानकारी सामने आई। वन्यजीव विशेषज्ञों और वन विभाग की टीम के लिए ऐसे पदचिह्न घटना की जांच में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
पदचिह्नों के आधार पर वन विभाग यह पता लगाने की कोशिश कर सकता है कि घटनास्थल के आसपास बाघ की आवाजाही हुई थी या नहीं। इसके साथ ही आसपास के क्षेत्र में कैमरा ट्रैप, पगमार्क और अन्य संकेतों की मदद से वन्यजीव की पहचान करने का प्रयास किया जा सकता है।
वन विभाग के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक तरफ घटना की वास्तविक वजह का पता लगाना और दूसरी तरफ आसपास के गांवों में किसी संभावित वन्यजीव खतरे को लेकर तत्काल निगरानी बढ़ाना।
वन क्षेत्राधिकारी दीपक मिश्रा ने टीम को मौके पर भेजा
महिला के लापता होने और उसके अवशेष मिलने की सूचना के बाद वन विभाग सक्रिय हुआ। वन क्षेत्राधिकारी दीपक मिश्रा ने बताया कि मामले की जानकारी मिलने पर टीम को मौके पर भेजा गया है।
वन विभाग की टीम घटनास्थल का निरीक्षण कर रही है और वन्यजीव की पहचान तथा घटना की परिस्थितियों की जांच की जा रही है।
जमिया के अन्य अवशेषों की तलाश भी की जा रही है। इस दौरान वन विभाग की टीम आसपास के क्षेत्र में मौजूद संभावित संकेतों को भी देख रही है।
मोतीपुर रेंज में सात साल के बच्चे पर तेंदुए का हमला
इसी दिन दूसरी घटना मोतीपुर रेंज में सामने आई। यहां चमारन पुरवा निवासी सात वर्षीय सूरज एक अन्य बच्चे के साथ शुक्रवार दोपहर खेत की ओर गया था।
दोनों बच्चे गांव से निकलकर खेत की तरफ जा रहे थे। इसी दौरान झाड़ियों से अचानक एक तेंदुआ निकलने की बात सामने आई। तेंदुए ने सूरज पर हमला कर उसे झाड़ियों की ओर खींच लिया।
साथ मौजूद दूसरा बच्चा किसी तरह वहां से भाग निकला और गांव पहुंचकर परिजनों को घटना की जानकारी दी।
बच्चे के गांव पहुंचते ही परिवार में अफरा-तफरी मच गई। सूचना मिलने के बाद ग्रामीण बड़ी संख्या में घटनास्थल की ओर पहुंचे और मासूम की तलाश शुरू की।
ग्रामीणों ने झाड़ियों में शुरू की मासूम की तलाश
सूरज के तेंदुए द्वारा खींचे जाने की जानकारी मिलने के बाद ग्रामीणों ने आसपास के खेतों और झाड़ियों में तलाश शुरू की। बच्चे को जल्द से जल्द खोजने की कोशिश की गई।
इलाका जंगल के नजदीक होने के कारण तलाश के दौरान ग्रामीणों में भय भी बना हुआ था। इसके बावजूद परिजन और अन्य लोग मासूम को खोजने के लिए जुटे रहे।
शाम करीब 6 बजे झाड़ियों के पास सूरज का क्षत-विक्षत शव बरामद हुआ।
मासूम की मौत की खबर मिलते ही गांव में मातम पसर गया। परिवार के लोगों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया, जबकि घटना की जानकारी मिलने के बाद पुलिस और वन विभाग की टीम भी मौके पर पहुंची।
सात साल के मासूम की मौत से गांव में पसरा मातम
सूरज की उम्र महज सात साल थी। इतनी कम उम्र में वन्यजीव के हमले में उसकी मौत ने पूरे गांव को झकझोर दिया।
ग्रामीणों के लिए यह घटना इसलिए भी बेहद भयावह है क्योंकि हमला दिन के समय हुआ। आम तौर पर लोग यह मान लेते हैं कि जंगली जानवरों का खतरा मुख्य रूप से रात में बढ़ता है, लेकिन जंगल से सटे इलाकों में दिन के समय भी वन्यजीवों की मौजूदगी से इनकार नहीं किया जा सकता।
सूरज के साथ मौजूद बच्चे के सुरक्षित भागकर गांव पहुंचने से घटना की जानकारी परिवार तक पहुंची। यदि वह बच्चा समय रहते गांव नहीं पहुंचता तो ग्रामीणों को घटना की जानकारी मिलने में और देरी हो सकती थी।
एक ही दिन में दो घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग में एक ही दिन बाघ और तेंदुए के हमले की दो अलग-अलग घटनाओं ने वन क्षेत्र से सटे गांवों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
एक घटना में 55 वर्षीय महिला लापता हुईं और उनके शरीर का एक हिस्सा बरामद हुआ, जबकि दूसरी घटना में सात वर्षीय बच्चे की मौत हो गई।
दोनों घटनाएं अलग-अलग रेंज में हुई हैं। इसलिए यह जरूरी नहीं कि दोनों का आपस में कोई प्रत्यक्ष संबंध हो। लेकिन एक ही दिन में दो घटनाओं के सामने आने से मानव-वन्यजीव संघर्ष का मुद्दा जरूर गंभीर हो गया है।
जंगल से सटे गांवों में बढ़ा डर
घटनाओं के बाद कतर्नियाघाट के आसपास बसे गांवों में ग्रामीणों के बीच डर का माहौल है। खेतों में काम करने, पशुओं को चराने और जंगल की सीमा के आसपास जाने वाले लोग अब अधिक सावधानी बरत रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि जंगल से निकलकर वन्यजीव आबादी या खेतों के आसपास आने लगे तो बच्चों और बुजुर्गों के लिए खतरा बढ़ जाता है।
ऐसे में वन विभाग से मांग की जा रही है कि संवेदनशील गांवों और रास्तों पर निगरानी बढ़ाई जाए तथा ग्रामीणों को वन्यजीवों की गतिविधियों के बारे में समय रहते जानकारी दी जाए।
बरसात में क्यों बढ़ सकती है वन्यजीवों की आवाजाही
बरसात का मौसम जंगल और वन्यजीवों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। भारी बारिश, जलभराव, भोजन की उपलब्धता और वन क्षेत्र में बदलती परिस्थितियों के कारण वन्यजीव कभी-कभी अपने सामान्य क्षेत्र से बाहर भी दिखाई दे सकते हैं।
हालांकि हर वन्यजीव की गतिविधि को केवल मौसम से जोड़ना उचित नहीं होगा। किसी विशेष इलाके में वन्यजीव की आवाजाही के कई कारण हो सकते हैं।
यही वजह है कि वन विभाग के लिए स्थानीय स्तर पर निगरानी, कैमरा ट्रैप, गश्त और ग्रामीणों से मिलने वाली सूचनाओं का त्वरित संकलन महत्वपूर्ण हो जाता है।
ग्रामीणों के लिए खेत और जंगल की सीमा बनी चुनौती
कतर्नियाघाट क्षेत्र में बड़ी संख्या में ऐसे गांव हैं जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी जंगल और कृषि क्षेत्र से जुड़ी हुई है। ग्रामीणों को खेतों में काम करने, पशु चराने और जंगल से लगे रास्तों से गुजरने की जरूरत पड़ती है।
ऐसे में मानव और वन्यजीव के बीच दूरी बनाए रखना हमेशा आसान नहीं होता।
यही कारण है कि वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण सुरक्षा भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। किसी भी वन्यजीव को केवल खतरे के रूप में देखना संरक्षण की दृष्टि से उचित नहीं है, लेकिन जब कोई वन्यजीव मानव आबादी के करीब आकर हमला करता है तो तत्काल सुरक्षा उपाय जरूरी हो जाते हैं।
वन विभाग की टीमें मौके पर, जांच शुरू
दोनों घटनाओं की जानकारी मिलने के बाद वन विभाग की टीमें संबंधित स्थानों पर पहुंचीं। पुलिस ने भी मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की।
धर्मापुर रेंज में महिला के अवशेष मिलने के बाद वन विभाग की टीम वन्यजीव की पहचान और घटना की परिस्थितियों का पता लगाने में जुटी है। वहीं मोतीपुर रेंज में बच्चे के शव की बरामदगी के बाद पुलिस और वन विभाग ने घटनास्थल का निरीक्षण किया।
जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि घटना किस परिस्थिति में हुई और क्या आसपास किसी वन्यजीव की लगातार गतिविधि के संकेत मिल रहे हैं।
डीएफओ अपूर्व दीक्षित ने दी सतर्कता की सलाह
डीएफओ अपूर्व दीक्षित ने दोनों घटनाओं की सूचना मिलने की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि वन विभाग की टीमें मौके पर पहुंचकर जांच कर रही हैं।
उन्होंने प्रभावित परिवारों को नियमानुसार सहायता उपलब्ध कराने की बात भी कही है।
डीएफओ ने बरसात के मौसम को देखते हुए जंगल और खेतों के आसपास रहने वाले लोगों से विशेष सतर्कता बरतने की अपील की है।
वन विभाग की यह अपील ऐसे समय में आई है जब एक ही दिन में दो अलग-अलग वन्यजीव हमलों ने स्थानीय आबादी की चिंता बढ़ा दी है।
ग्रामीणों से अकेले जंगल या खेत की ओर न जाने की अपील जरूरी
वन्यजीवों की मौजूदगी वाले इलाकों में अकेले जाने से बचना महत्वपूर्ण है। खासकर छोटे बच्चों को जंगल, झाड़ियों या सुनसान खेतों की ओर अकेले नहीं भेजना चाहिए।
पशुओं को चराने वाले ग्रामीणों के लिए भी समूह में जाना अपेक्षाकृत सुरक्षित हो सकता है। झाड़ियों, घने वन क्षेत्र या ऐसी जगह जहां वन्यजीव छिप सकता हो, वहां विशेष सावधानी बरतना जरूरी है।
यदि किसी क्षेत्र में वन विभाग की ओर से वन्यजीव की गतिविधि की सूचना दी गई हो तो ग्रामीणों को उस चेतावनी को गंभीरता से लेना चाहिए।
वन्यजीव दिखने पर क्या नहीं करना चाहिए
जंगल या आबादी के आसपास बाघ या तेंदुआ दिखाई देने पर उसे घेरने, उसके करीब जाने या भीड़ लगाकर उसका पीछा करने से स्थिति और खतरनाक हो सकती है।
वन्यजीव को उकसाने या उसके रास्ते को रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। ऐसी स्थिति में तत्काल वन विभाग को सूचना देना और सुरक्षित स्थान पर रहना अधिक उचित है।
विशेष रूप से सोशल मीडिया के लिए वन्यजीव की तस्वीर या वीडियो बनाने की कोशिश में उसके बहुत करीब जाना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
बच्चों की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता
मोतीपुर रेंज की घटना ने बच्चों की सुरक्षा को लेकर विशेष चिंता पैदा कर दी है। सात वर्षीय सूरज जिस समय खेत की ओर गया था, वह एक अन्य बच्चे के साथ था। तेंदुए के हमले के बाद दूसरा बच्चा भागकर गांव पहुंचा।
इस घटना के बाद जंगल से सटे गांवों में अभिभावकों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे बच्चों को अकेले खेत, झाड़ियों या जंगल की सीमा की ओर न जाने दें।
स्कूल आने-जाने वाले बच्चों के रास्तों पर भी यदि वन्यजीव की गतिविधि की जानकारी मिले तो स्थानीय प्रशासन और वन विभाग को सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
मानव-वन्यजीव संघर्ष का बढ़ता सवाल
बहराइच की ये घटनाएं मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीरता को सामने लाती हैं। एक ओर बाघ, तेंदुआ और अन्य वन्यजीवों का संरक्षण जरूरी है, दूसरी ओर जंगल के आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
जब जंगल और मानव बस्तियों के बीच दूरी कम होती है तो वन्यजीवों और मनुष्यों के बीच टकराव की संभावना बढ़ सकती है। खेती, पशुपालन और ग्रामीणों की दैनिक गतिविधियां अक्सर जंगल की सीमा तक पहुंचती हैं।
इसलिए समस्या का समाधान केवल किसी एक जानवर को पकड़ने या जंगल में वापस भेजने तक सीमित नहीं हो सकता। लंबे समय में निगरानी, जागरूकता, सुरक्षित आवागमन, वन क्षेत्र की बेहतर सुरक्षा और स्थानीय समुदाय के साथ लगातार संवाद जरूरी है।
कतर्नियाघाट में निगरानी बढ़ाना क्यों जरूरी
कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग जैव विविधता और वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां बाघ, तेंदुए और अन्य वन्यजीव पाए जाते हैं। ऐसे क्षेत्र में मानव गतिविधियों और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण काम है।
वन विभाग के लिए यह जरूरी है कि जहां किसी हमलावर वन्यजीव की गतिविधि की आशंका हो, वहां निगरानी बढ़ाई जाए। संवेदनशील गांवों की पहचान, नियमित गश्त और जरूरत के अनुसार कैमरा ट्रैप जैसी तकनीकों का इस्तेमाल इस दिशा में मददगार हो सकता है।
ग्रामीणों को समय पर चेतावनी देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
मुआवजा और प्रभावित परिवारों की सहायता का सवाल
वन्यजीव हमले में किसी व्यक्ति की मौत पूरे परिवार को आर्थिक और मानसिक संकट में डाल देती है। खासकर ग्रामीण परिवारों में जहां आय का बड़ा हिस्सा एक या दो सदस्यों पर निर्भर हो सकता है।
डीएफओ अपूर्व दीक्षित ने प्रभावित परिवारों को नियमानुसार सहायता उपलब्ध कराने की बात कही है। अब परिवारों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत सहायता मिलने की उम्मीद है।
ऐसी घटनाओं में आर्थिक सहायता के साथ-साथ परिवार को प्रशासनिक सहयोग और आवश्यक मार्गदर्शन उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण होता है।
क्या हमलावर बाघ और तेंदुए की पहचान हो पाएगी?
धर्मापुर रेंज में मिले बाघ के पदचिह्न जांच में अहम सुराग साबित हो सकते हैं। वन विभाग इलाके में मौजूद अन्य संकेतों के आधार पर यह पता लगाने की कोशिश कर सकता है कि वास्तव में किस वन्यजीव की गतिविधि घटना से जुड़ी है।
मोतीपुर रेंज में भी तेंदुए की गतिविधि की निगरानी करना महत्वपूर्ण होगा। यदि आसपास तेंदुए की लगातार मौजूदगी के संकेत मिलते हैं तो वन विभाग को ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़ सकते हैं।
वन्यजीव की पहचान होने के बाद ही उसके व्यवहार और संभावित खतरे का आकलन अधिक सटीक तरीके से किया जा सकता है।
एक दिन, दो घटनाएं और कई सवाल
शुक्रवार को हुई दोनों घटनाओं ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या जंगल से सटे क्षेत्रों में वन्यजीवों की निगरानी पर्याप्त है? क्या संवेदनशील गांवों में लोगों को समय रहते चेतावनी दी जाती है? क्या खेतों और जंगल के बीच आवाजाही करने वाले लोगों के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय हैं?
इन सवालों का जवाब केवल जांच पूरी होने के बाद ही नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था में भी दिखाई देना चाहिए।
दोनों घटनाओं के कारण अलग हो सकते हैं और इनके पीछे अलग-अलग वन्यजीव भी हो सकते हैं, लेकिन दोनों ने ग्रामीण सुरक्षा को लेकर एक समान चिंता पैदा की है।
वन विभाग के सामने दोहरी जिम्मेदारी
वन विभाग की जिम्मेदारी एक तरफ वन्यजीवों की रक्षा करना है और दूसरी तरफ मानव जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करने में प्रशासन के साथ सहयोग करना भी है।
बाघ और तेंदुए जैसे शीर्ष शिकारी वन पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए किसी घटना के बाद तत्काल भावनाओं में आकर वन्यजीवों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय वैज्ञानिक और नियंत्रित तरीके से स्थिति का आकलन करना आवश्यक होता है।
लेकिन जब किसी वन्यजीव द्वारा मानव पर हमला होने की पुष्टि होती है तो प्रभावित क्षेत्र में लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना भी जरूरी हो जाता है।
ग्रामीणों की मांग—सिर्फ अपील नहीं, जमीन पर सुरक्षा चाहिए
घटनाओं के बाद ग्रामीणों ने हमलावर वन्यजीवों की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाने की मांग की है। ग्रामीणों के लिए केवल सतर्कता की अपील पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उन्हें अपने खेतों और घरों के आसपास वास्तविक सुरक्षा व्यवस्था भी दिखाई देनी चाहिए।
संवेदनशील इलाकों में वन विभाग की नियमित गश्त, वन्यजीवों की निगरानी और सूचना तंत्र को मजबूत करना इस दिशा में उपयोगी हो सकता है।
यदि किसी क्षेत्र में लगातार वन्यजीव दिखाई दे रहा हो तो ग्रामीणों को तत्काल सूचना देने के लिए प्रभावी व्यवस्था भी जरूरी है।
बहराइच में वन्यजीवों के साथ सुरक्षित सह-अस्तित्व की चुनौती
कतर्नियाघाट जैसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्र के आसपास मानव बस्तियों का होना अपने आप में एक जटिल स्थिति पैदा करता है। जंगल वन्यजीवों का प्राकृतिक घर है, जबकि आसपास रहने वाले ग्रामीणों की आजीविका खेती और पशुपालन पर निर्भर है।
दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना आसान नहीं है। लेकिन वैज्ञानिक निगरानी, बेहतर प्रशासनिक समन्वय और ग्रामीणों की भागीदारी से जोखिम को कम किया जा सकता है।
शुक्रवार की घटनाओं ने इस आवश्यकता को और स्पष्ट कर दिया है।
आगे क्या करेगा वन विभाग?
फिलहाल वन विभाग दोनों घटनाओं की जांच कर रहा है। धर्मापुर रेंज में महिला के अन्य अवशेषों की तलाश जारी है और घटनास्थल पर मिले पदचिह्नों समेत अन्य संकेतों की जांच की जा रही है।
मोतीपुर रेंज में बच्चे की मौत के बाद भी आसपास के क्षेत्र की निगरानी महत्वपूर्ण होगी। यह पता लगाना जरूरी होगा कि क्या तेंदुआ अभी भी आसपास मौजूद है और क्या इलाके में उसके पहले भी देखे जाने की कोई सूचना मिली थी।
वन विभाग की जांच के बाद ही दोनों घटनाओं से जुड़े कई सवालों के स्पष्ट जवाब सामने आ सकेंगे।
कतर्नियाघाट में शुक्रवार का दिन छोड़ गया गहरा डर
एक तरफ 55 वर्षीय जमिया बकरियां चराने खेत गईं और वापस नहीं लौटीं। दूसरी तरफ सात वर्षीय सूरज एक बच्चे के साथ खेत की ओर गया और तेंदुए के हमले का शिकार हो गया। कुछ ही घंटों के अंतराल में सामने आई इन घटनाओं ने कतर्नियाघाट क्षेत्र के ग्रामीणों को गहरे सदमे में डाल दिया है।
जमिया के केवल पैर का हिस्सा मिलने और आसपास बाघ के पदचिह्न पाए जाने से मामला बेहद गंभीर हो गया है। वहीं सूरज का क्षत-विक्षत शव झाड़ियों के पास मिलने के बाद पूरे गांव में मातम है।
वन विभाग और पुलिस दोनों घटनाओं की जांच कर रहे हैं। प्रभावित परिवारों को नियमानुसार सहायता देने की बात कही गई है। अब सबसे बड़ी जरूरत यह है कि जांच के साथ-साथ जंगल से लगे गांवों में तत्काल निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाए, ताकि किसी और परिवार को ऐसी भयावह घटना का सामना न करना पड़े।

