Akhilesh Yadav 30 सितंबर की INDIA गठबंधन बैठक से रहेंगे दूर, खरगे से हुई बात; सीट शेयरिंग की खींचतान के बीच सपा प्रमुख के बयान ने बढ़ाई सियासी हलचल
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन तथा सीट शेयरिंग को लेकर जारी बयानबाजी के बीच सपा अध्यक्ष Akhilesh Yadav ने 30 सितंबर को दिल्ली में होने वाली INDIA गठबंधन की बैठक से दूरी बनाने की जानकारी दी है। अखिलेश यादव ने कहा कि वह उस दिन व्यस्त रहेंगे और बैठक में शामिल नहीं हो पाएंगे। उन्होंने यह भी बताया कि इस संबंध में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से उनकी बातचीत हो चुकी है और उनकी जगह समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता बैठक में शामिल होंगे।
अखिलेश के इस फैसले को ऐसे समय में देखा जा रहा है जब उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस के बीच 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सीटों के बंटवारे पर अभी औपचारिक बातचीत शुरू नहीं हुई है। दोनों दल सार्वजनिक रूप से गठबंधन को लेकर सकारात्मक संकेत देते रहे हैं, लेकिन सीटों के दावों को लेकर दोनों ओर से अलग-अलग बयान सामने आ रहे हैं। ऐसे में सपा प्रमुख का INDIA गठबंधन की बैठक में खुद मौजूद न रहना राजनीतिक चर्चा का नया विषय बन गया है।
हालांकि अखिलेश यादव ने बैठक से अनुपस्थित रहने की वजह के तौर पर अपनी व्यस्तता बताई है। इसलिए उनकी गैरमौजूदगी को लेकर किसी निश्चित राजनीतिक निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। इतना जरूर है कि यूपी में सीट शेयरिंग को लेकर दोनों दलों के बीच सार्वजनिक बयानबाजी का दौर जारी है और आने वाले दिनों में बातचीत का स्वरूप महत्वपूर्ण रहने वाला है।
30 सितंबर की बैठक में क्या होने वाला है?
INDIA गठबंधन की 30 सितंबर को प्रस्तावित बैठक का प्रमुख मुद्दा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR से जुड़े मुद्दे बताए जा रहे हैं। विपक्षी दल चुनावी मतदाता सूचियों में बदलाव और उससे जुड़ी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं। बैठक में विपक्षी दल आगे की संयुक्त रणनीति पर चर्चा कर सकते हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक, विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ भी राजनीतिक कार्रवाई की मांग को लेकर चर्चा कर रहे हैं। INDIA गठबंधन के भीतर कई दल SIR प्रक्रिया को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज करा चुके हैं।
ऐसे समय में सपा प्रमुख की गैरमौजूदगी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि अखिलेश यादव खुद उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची और कथित ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को लगातार उठा रहे हैं।
अखिलेश ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता दिल्ली की बैठक में मौजूद रहेंगे। यानी सपा गठबंधन की बैठक से पूरी तरह दूर नहीं रहेगी, बल्कि पार्टी का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ नेता करेंगे।
खरगे से हो चुकी है अखिलेश यादव की बातचीत
अखिलेश यादव ने पत्रकार वार्ता में कहा कि 30 सितंबर को वह व्यस्त हैं और इसी वजह से बैठक में शामिल नहीं हो सकेंगे। उनके मुताबिक, उन्होंने इस संबंध में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से बात कर ली है।
उनका यह बयान उस समय आया है जब कांग्रेस और सपा के बीच उत्तर प्रदेश में 403 विधानसभा सीटों को लेकर भविष्य की रणनीति पर चर्चाएं तेज हो रही हैं।
इससे पहले अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि 2027 में गठबंधन रहेगा और सीटों का बंटवारा ‘विनिबिलिटी’ यानी जीतने की क्षमता के आधार पर किया जाना चाहिए।
इस बयान के बाद सीट शेयरिंग को लेकर दोनों दलों की रणनीति पर चर्चा और तेज हुई है।
सपा-कांग्रेस सीट शेयरिंग में क्या है असली पेंच?
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव के लिए सपा और कांग्रेस के बीच अभी सीट शेयरिंग का अंतिम फॉर्मूला तय नहीं हुआ है। 26 सितंबर की रिपोर्टों के मुताबिक दोनों दलों के बीच औपचारिक सीट-बंटवारे की बातचीत अभी शुरू नहीं हुई थी।
हालांकि, दोनों पार्टियां अपनी-अपनी तैयारियों में जुटी हैं।
कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपने संगठन को मजबूत करने के लिए संगठन सृजन अभियान चला रही है, जबकि समाजवादी पार्टी ने PDA रथ यात्रा के जरिए अपने चुनावी अभियान को धार देना शुरू किया है।
यानी एक तरफ गठबंधन को लेकर सकारात्मक बयान दिए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दोनों दल अपने संगठन और चुनावी आधार को मजबूत करने में लगे हुए हैं।
कांग्रेस की नजर कितनी सीटों पर?
मीडिया रिपोर्टों में कांग्रेस की ओर से उत्तर प्रदेश की विधानसभा सीटों में बड़ी हिस्सेदारी की मांग की चर्चा है। एक रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस ने 403 सीटों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर उन सीटों की पहचान की है जहां वह अपने संगठन और संभावित उम्मीदवारों के आधार पर दावा कर सकती है।
दूसरी रिपोर्ट में कांग्रेस की ओर से 125 से 135 सीटों के दावे की बात सामने आई है। वहीं कुछ रिपोर्टों में कांग्रेस के संभावित दावे को इससे भी अधिक बताया गया है।
इन आंकड़ों पर दोनों दलों के बीच अंतिम सहमति अभी नहीं बनी है। इसलिए इन्हें आधिकारिक सीट बंटवारा नहीं बल्कि मीडिया में सामने आए संभावित दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
अखिलेश की रणनीति: सीट वही जिसे जीतने की क्षमता हो
अखिलेश यादव पहले ही संकेत दे चुके हैं कि 2027 में गठबंधन के भीतर सीटों का बंटवारा जीतने की क्षमता को आधार बनाकर होना चाहिए।
उन्होंने कहा था कि जिस दल या उम्मीदवार में किसी सीट पर जीतने की क्षमता है, उसे वह सीट मिलनी चाहिए।
यह रुख सीटों की संख्या के बजाय चुनावी प्रदर्शन और स्थानीय संगठन को आधार बनाने की रणनीति की ओर संकेत करता है।
2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था। सपा ने 37 सीटें जीतीं और कांग्रेस को छह सीटों पर जीत मिली। दोनों दलों ने मिलकर 43 सीटें हासिल की थीं, जबकि भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई थी।
यही प्रदर्शन अब दोनों पार्टियों के बीच सीट शेयरिंग की बातचीत में महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।
2022 में अलग-अलग चुनाव, 2024 में साथ और अब 2027 की तैयारी
सपा और कांग्रेस के रिश्तों को समझने के लिए पिछले दो विधानसभा और लोकसभा चुनाव महत्वपूर्ण हैं।
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव मैदान में थीं। उस चुनाव में भाजपा ने 255 सीटें जीती थीं और समाजवादी पार्टी 111 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही थी। कांग्रेस को केवल दो सीटें मिली थीं।
इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में गठबंधन किया। परिणामों में दोनों दलों को पहले की तुलना में महत्वपूर्ण सफलता मिली।
अब 2027 विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियां इस गठबंधन को आगे ले जाने की तैयारी में हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव से अलग राजनीतिक गणित लेकर आता है। 403 सीटों पर स्थानीय संगठन, उम्मीदवार, जातीय समीकरण, क्षेत्रीय प्रभाव और बूथ स्तर की ताकत जैसे मुद्दे सीट शेयरिंग में भूमिका निभा सकते हैं।
अखिलेश ने ‘वोट चोरी’ को बनाया बड़ा राजनीतिक मुद्दा
सीट शेयरिंग की चर्चा के साथ-साथ अखिलेश यादव लगातार ‘वोट चोरी’ के आरोपों को भी राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं।
लखनऊ स्थित सपा मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग को अपनी विश्वसनीयता बनाए रखनी चाहिए और किसी के इशारे पर काम नहीं करना चाहिए।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ‘वोट चोरी’ और चुनावी अनियमितताओं से जुड़े ये आरोप अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी द्वारा लगाए गए राजनीतिक आरोप हैं। इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में नहीं बल्कि उनके दावे के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
अखिलेश का आरोप—चुनाव आयोग ने शिकायतों पर कार्रवाई नहीं की
अखिलेश यादव ने कहा कि समाजवादी पार्टी ने चुनावी प्रक्रिया और कथित वोट अनियमितताओं को लेकर चुनाव आयोग के सामने कई बार शिकायतें रखीं, लेकिन उनकी शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
उन्होंने उपचुनावों के दौरान भी कथित अनियमितताओं का आरोप लगाया और कहा कि लोगों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में गड़बड़ी होते देखी।
अखिलेश का कहना है कि मतदाता सूची में नामों के साथ कथित छेड़छाड़ और वोट डालने में रुकावट जैसे मुद्दे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से सीधे जुड़े हैं।
हालांकि, इन आरोपों का अंतिम मूल्यांकन संबंधित निर्वाचन अधिकारियों, न्यायिक संस्थाओं और उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर ही किया जा सकता है।
SIR और Form-7 को लेकर भी अखिलेश ने उठाए सवाल
उत्तर प्रदेश में चल रही Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर भी समाजवादी पार्टी लगातार सवाल उठा रही है।
अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि भाजपा की ओर से मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए Form-7 का इस्तेमाल कराया गया और इसे लेकर गांव-गांव तक फॉर्म पहुंचाए गए।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एक व्यक्ति ने बड़ी संख्या में Form-7 आवेदन किए।
इन आरोपों के संदर्भ में यह समझना महत्वपूर्ण है कि Form-7 मतदाता सूची में किसी नाम को हटाने के लिए निर्धारित चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है। किसी आवेदन का दाखिल होना अपने आप में गलत तरीके से वोट हटाए जाने का प्रमाण नहीं होता। यदि किसी आवेदन या प्रक्रिया में नियमों के उल्लंघन का आरोप है, तो उसका परीक्षण संबंधित चुनावी अधिकारियों और कानूनी प्रक्रिया के जरिए किया जाना आवश्यक है।
अखिलेश का दावा—2022 में बड़ी संख्या में वोट काटे गए
सपा अध्यक्ष ने 2022 के विधानसभा चुनाव का जिक्र करते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी समर्थकों के बड़ी संख्या में वोट काटे गए थे।
उन्होंने दावा किया कि ऐसे लोग जिन्होंने 2019 में मतदान किया था, वे 2022 में मतदान नहीं कर सके।
इसी तरह उन्होंने कहा कि अब जब कथित चुनावी अनियमितताओं से जुड़ी खबरें सामने आ रही हैं, तब लोगों को इस विषय की गंभीरता समझ में आ रही है।
यहां भी अखिलेश यादव द्वारा किए गए दावों और आधिकारिक रूप से प्रमाणित चुनावी आंकड़ों के बीच अंतर करना जरूरी है। किसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता सूची में बदलाव हुआ हो, तो उसकी वजह और वैधता संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर ही तय की जा सकती है।
नोएडा में फर्जी वोट बनने का भी लगाया आरोप
अखिलेश यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में नोएडा में फर्जी वोट बनाए जाने का भी आरोप लगाया।
उन्होंने दावा किया कि कथित तौर पर गलत तरीके से मतदाता बनाए जा रहे हैं।
यह आरोप भी फिलहाल राजनीतिक बयान के रूप में सामने आया है। ऐसे दावों की पुष्टि के लिए संबंधित मतदाता सूची, आवेदन प्रक्रिया और निर्वाचन अधिकारियों के रिकॉर्ड की जांच आवश्यक होगी।
चुनाव संबंधी आरोपों के मामले में दस्तावेजी प्रमाण और आधिकारिक जांच का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया कानून और निर्धारित नियमों के तहत संचालित होती है।
पश्चिम बंगाल और बिहार में दोबारा चुनाव की मांग
अखिलेश यादव ने चुनाव में कथित अनियमितताओं से जुड़ी खबरों का स्वतः संज्ञान लेने की मांग करते हुए कहा कि अदालतों को पश्चिम बंगाल और बिहार में दोबारा चुनाव कराने पर विचार करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों की खबरों के मद्देनजर न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी है।
हालांकि, किसी राज्य में चुनाव दोबारा कराने का निर्णय संवैधानिक और चुनावी प्रक्रिया के तहत संबंधित संस्थाओं और अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आता है। केवल राजनीतिक बयान के आधार पर किसी चुनाव को दोबारा कराए जाने की स्थिति नहीं बनती।
‘2024 में भाजपा को हराया, 2027 में सफाया करेंगे’—अखिलेश
अखिलेश यादव ने 2024 के लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन का हवाला देते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी ने भाजपा को हराया और 2027 में भाजपा का सफाया कर देगी।
यह अखिलेश यादव का राजनीतिक दावा और चुनावी लक्ष्य है, न कि चुनाव परिणाम की कोई स्वतंत्र भविष्यवाणी।
2024 में उत्तर प्रदेश में सपा 37 सीटों के साथ सबसे अधिक लोकसभा सीट जीतने वाली पार्टी बनी थी। कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं और दोनों दलों का संयुक्त आंकड़ा 43 रहा। भाजपा ने 33 सीटें जीती थीं।
अब 2027 का विधानसभा चुनाव अलग चुनावी परिस्थितियों में होगा और उसका परिणाम वर्तमान में निर्धारित नहीं है।
भाजपा पर पूंजीपतियों के लिए काम करने का लगाया आरोप
अखिलेश यादव ने भाजपा पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि भाजपा पूंजीपतियों और बड़े उद्योगपतियों के हित में काम करती है।
उन्होंने भाजपा को ‘धन्नासेठों की पार्टी’ बताया और महंगाई, भ्रष्टाचार तथा आम लोगों से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार पर निशाना साधा।
ये अखिलेश यादव की राजनीतिक आलोचनाएं हैं। भाजपा की ओर से इन आरोपों पर अलग-अलग मौकों पर अपनी नीतियों और सरकार के कामकाज को लेकर जवाब दिए जाते रहे हैं।
शहरों में जलभराव को लेकर योगी सरकार पर निशाना
प्रेस कॉन्फ्रेंस में अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के कई शहरों में जलभराव को लेकर भी राज्य सरकार पर हमला बोला।
उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें सैफई के विकास से सीख लेनी चाहिए थी।
अखिलेश ने गोरखपुर का उदाहरण देते हुए कहा कि जहां मुख्यमंत्री मेट्रो रेल चलाने की घोषणा कर रहे थे, वहां बारिश के दौरान नाव चलाने जैसी स्थिति बन गई।
उन्होंने प्रयागराज और वाराणसी में भी जलभराव और शहरी व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठाए।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में भारी बारिश और जलभराव की समस्या राजनीतिक बहस का मुद्दा बनी हुई है। अखिलेश ने सरकार द्वारा जल निकासी और शहरी बुनियादी ढांचे पर खर्च किए गए धन के प्रभाव पर भी सवाल उठाए।
गोरखपुर से वाराणसी तक जलभराव का मुद्दा
अखिलेश यादव ने अपने बयान में गोरखपुर के अलावा प्रयागराज, वाराणसी और लखनऊ जैसे शहरों की स्थिति पर भी सवाल उठाए।
शहरी जलभराव का मुद्दा उत्तर प्रदेश में नया नहीं है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, जल निकासी व्यवस्था, नालों की क्षमता, अतिक्रमण और अत्यधिक बारिश जैसी कई परिस्थितियां जलभराव को प्रभावित कर सकती हैं।
राजनीतिक तौर पर विपक्ष इन समस्याओं को सरकार की प्रशासनिक क्षमता से जोड़कर सवाल उठा रहा है, जबकि सरकार की ओर से विभिन्न शहरों में जल निकासी और बुनियादी ढांचे से जुड़े कार्यों का हवाला दिया जाता है।
इस मुद्दे पर वास्तविक स्थिति शहर-दर-शहर अलग हो सकती है।
PDA रथ यात्रा से अखिलेश ने शुरू की 2027 की तैयारी
अखिलेश यादव ने हाल ही में PDA रथ यात्रा के जरिए उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों को तेज किया है।
रायबरेली से अभियान शुरू करना भी राजनीतिक रूप से चर्चा में रहा क्योंकि रायबरेली लोकसभा सीट से कांग्रेस नेता राहुल गांधी सांसद हैं। अखिलेश यादव ने वहीं से अपने अभियान की शुरुआत करते हुए गठबंधन और सीटों के बंटवारे पर अपनी रणनीति स्पष्ट की थी।
इससे यह संकेत मिलता है कि सपा 2027 की लड़ाई के लिए अपना संगठन और राजनीतिक संदेश दोनों मजबूत करने में जुटी है।
INDIA गठबंधन में अखिलेश की गैरमौजूदगी को लेकर क्या संकेत?
अखिलेश यादव का 30 सितंबर की बैठक में शामिल न होना राजनीतिक चर्चा का विषय जरूर बन गया है, लेकिन इसे सीधे सपा-कांग्रेस गठबंधन में टूट या किसी बड़े विवाद का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।
अखिलेश ने खुद कहा है कि वह उस दिन व्यस्त हैं और कांग्रेस अध्यक्ष खरगे से इस बारे में बात हो चुकी है। उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को बैठक में भेजने की बात भी कही है।
दूसरी तरफ, सपा-कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर सार्वजनिक बयानबाजी जरूर चल रही है। दोनों दलों की ओर से अपनी चुनावी क्षमता और संगठन को आधार बनाकर सीटों पर दावे सामने आ रहे हैं।
अगले कुछ सप्ताह इस लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं क्योंकि अक्टूबर में दोनों दलों के बीच औपचारिक बातचीत शुरू होने की रिपोर्टें सामने आई हैं।
कांग्रेस और सपा के बीच बातचीत का अगला चरण अक्टूबर में संभव
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सपा और कांग्रेस के बीच उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए सीट शेयरिंग पर बातचीत अक्टूबर में शुरू हो सकती है।
दोनों दलों के बीच संभावित समन्वय समितियों और वरिष्ठ नेतृत्व की बैठकों की चर्चा है। अंतिम फैसला शीर्ष नेतृत्व की सहमति के बाद ही होने की संभावना है।
इस बातचीत में 2024 लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन, 2022 विधानसभा चुनाव का अनुभव, वर्तमान संगठनात्मक स्थिति और प्रत्येक सीट पर उम्मीदवार की स्थिति जैसे पहलू महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
अब यूपी की राजनीति में तीन मोर्चों पर नजर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिलहाल तीन बड़े मुद्दे साथ-साथ आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
पहला, सपा-कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग।
दूसरा, SIR और मतदाता सूची को लेकर विपक्ष की आपत्तियां।
तीसरा, 2027 विधानसभा चुनाव के लिए सपा और भाजपा की तैयारियां।
कांग्रेस भी अपने संगठन को मजबूत कर रही है और सपा PDA के जरिए अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर भाजपा सत्ता में होने के कारण अपने संगठन और सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है।
30 सितंबर के बाद और तेज हो सकती है राजनीतिक गतिविधि
INDIA गठबंधन की 30 सितंबर की बैठक में अखिलेश यादव व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं होंगे, लेकिन सपा के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी के कारण पार्टी की भागीदारी बनी रहेगी।
बैठक के बाद चुनाव आयोग, SIR और विपक्ष की संयुक्त रणनीति को लेकर कोई नया राजनीतिक रुख सामने आता है या नहीं, इस पर नजर रहेगी।
इसके समानांतर उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग की बातचीत भी आगे बढ़ सकती है। दोनों दलों के बीच सहमति का आधार क्या होगा और कितनी सीटों पर कौन चुनाव लड़ेगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन उसकी राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है।

