पारसी लोग अपनो के मृतक शव का दाह संस्कार किस प्रकार करते हैं?
पिछले करीब तीन हजार वर्षों से पारसी धर्म के लोग दोखमेनाशिनी नाम से अंतिम संस्कार की परंपरा को निभाते आ रहे हैं। इस परंपरा को निभाने के लिए ये लोग पूर्णत: गिद्धों पर ही निर्भर हैं। क्योंकि गिद्ध ही मृतक के शव को अपना भोजन बनाते हैं।
टॉवर ऑफ साइलेंस
भारत में अधिकांशत: पारसी महाराष्ट्र के मुंबई शहर में ही रहते हैं, जो टॉवर ऑफ साइलेंस पर अपने संबंधियों के शवों का अंतिम संस्कार करते हैं। टॉवर ऑफ साइलेंस एक तरह का गार्डन है जिसकी चोटी पर ले जाकर शव को रख दिया जाता है, फिर गिद्ध आकर उस शव को ग्रहण कर लेते हैं।
विलुप्त हो रही है प्रजाति
लेकिन जैसे-जैसे गिद्धों की तादाद कम होती जा रही है, वैसे-वैसे यह बहस भी तेज होने लगी है कि अब जब गिद्धों की प्रजाति विलुप्तता के कगार पर पहुंच गई है तो क्या अब पारसियों को अंतिम संस्कार करने का कोई अन्य विकल्प ढूंढ़ लेना चाहिए?
गिद्धों की संख्या
जानकारों के अनुसार 1980 के दशक में गिद्धों की संख्या करीब 40 मिलियन के करीब थी, लेकिन अब यह संख्या कम होते-होते मात्र 100,000 ही रह गई है। विकल्प के तौर पर यह कहा जाने लगा है कि शवों को सुखाने के लिए सौर संकेन्द्रक के उपयोग और उनके मांस को चील और कौए के लिए छोड़ने वाली तमाम प्रक्रियाएं गिद्धों के बगैर पूरी तरह निष्प्रभावी हैं।
परंपरा में बदलाव
कुछ लोग यह स्पष्ट कहते हैं कि पारसी धर्म के लोगों द्वारा अपनाई जाने वाली यह परंपरा अपने अंतिम चरण पर है। लेकिन पारसी सिद्धांतवादियों का कहना है कि वह इसके अलावा किसी अन्य प्रथा को अंतिम संस्कार के तौर पर अपना ही नहीं सकते।
वातावरण का दूषित होना
मुंबई में जिन पारसियों का निधन पिछले वर्ष हुआ, उनमें से अधिकांश या कह लीजिए लगभग सभी ने गिद्धों का भोजन बनकर अंतिम विदाई लेना ही तय किया था। उनका मानना था कि जमीन में दफनाने या दाह संस्कार करने से वातावरण दूषित होता है।
मान्यता और परंपरा पर दृढ़ पारसी
सुधारवादी लोग पारसियों के मृत शवों को दफनाए या जलाए जाने जैसी परंपरा की वकालत करते हैं वहीं परंपरावादी पारसी इस प्रथा को छोड़ना तक नहीं चाहते।
पारिस्थितिकी तंत्र के अनुकूल
मुंबई में जोरास्ट्रियन स्टडीज़ इंस्टीट्यूट के संस्थापक जहांगीर पटेल का कहना है कि हजारों खामियों के बावजूद पारसियों को अंतिम विदाई देने का तरीका पारिस्थितिकी तंत्र के अनुकूल है। इससे किसी भी तत्व को कोई नुकसान नहीं पहुंचता।
कैसे बदलें परंपरा
प्रथा को बदल देने जैसी बात तो परंपरावादी पारसियों के गले भी नहीं उतरती। उनका कहना है कि यह तो कुछ ऐसा है जैसे कोई किसी मुस्लिम को यह कहे कि वह अपने परिजन के शव को दफनाए नहीं बल्कि जला दे।
ईरानी पारसी
जहांगीर पटेल का कहना है ईरानी पारसी लोग अपेक्षाकृत ज्यादा व्यवहारिक हैं। वे यह समझ गए थे कि अब हालात बदलने लगे हैं इसलिए उन्होंने करीब 50 वर्ष पहले ही दफनाए जाने की प्रथा को स्वीकार कर लिया था।
बहस का अंत
खैर जो भी है, दोनों ओर से देखा जाए तो हमें तो दोनों ही पक्ष सही लगते हैं। परंपरावादी पारसी अपनी जगह सही हैं क्योंकि परंपरा से खिलवाड़ करना इतना भी सही नहीं है
वहीं सुधारवादियों का यह कहना कि अंतिम संस्कार के रूप में विकल्प का चयन कर लिया जाना चाहिए, गिद्धों की घटती संख्या को देखकर सही मालूम होता है। इस बहस का अंत वक्त के साथ ही हो सकता है।
(एक पाठक द्वारा)

