‘पहले आतंकवाद पर कार्रवाई, फिर बातचीत’: भारत-पाक ओपन लेटर विवाद पर विश्व हिंदू महासंघ भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष Pramod Tyagi का तीखा बयान
भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों को सामान्य बनाने तथा द्विपक्षीय वार्ता बहाल करने की मांग को लेकर 117 भारतीय और पाकिस्तानी हस्तियों द्वारा दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों को लिखे गए खुले पत्र (ओपन लेटर) पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाओं का दौर लगातार जारी है। इसी क्रम में विश्व हिंदू महासंघ भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष Pramod Tyagi (एडवोकेट) ने इस पहल पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे “शांति के नाम पर राजनीतिक नौटंकी” बताया।
उन्होंने कहा कि जब तक सीमा पार से होने वाले आतंकवाद पर निर्णायक और प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, तब तक इस प्रकार की अपीलें देश की सुरक्षा और जनता की भावनाओं के अनुरूप नहीं मानी जा सकतीं।
‘आतंकवाद रुके, उसके बाद ही बातचीत की बात हो’
प्रमोद त्यागी ने अपने बयान में कहा कि भारत हमेशा शांति का समर्थक रहा है, लेकिन शांति का वातावरण तभी संभव है जब आतंकवाद पर प्रभावी रोक लगे।
उन्होंने कहा कि सीमा पार से लगातार होने वाली आतंकी गतिविधियों के बीच केवल संवाद की अपील करना व्यावहारिक समाधान नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार, किसी भी प्रकार की वार्ता से पहले आतंकवाद के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय कार्रवाई आवश्यक है।
‘सिर्फ खुले पत्रों से न सीमा सुरक्षित होगी, न आतंकवाद समाप्त’
राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि कागज पर अपील लिख देने मात्र से न तो सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित होती है और न ही आतंकवाद जैसी गंभीर चुनौती का समाधान निकलता है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर केवल प्रतीकात्मक पहल के बजाय ठोस और प्रभावी रणनीति अपनाई जानी चाहिए।
‘सीमा पर तैनात जवानों का त्याग भी समझना होगा’
प्रमोद त्यागी ने कहा कि जो लोग शांति की वकालत कर रहे हैं, उन्हें सीमा पर तैनात सुरक्षा बलों के त्याग और आतंकवाद से प्रभावित परिवारों की पीड़ा को भी समझना चाहिए।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर किसी भी पहल का आकलन उन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए, जिनका सामना देश के जवान और सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिक करते हैं।
‘हर बार उधर से गोली, इधर से ओपन लेटर—यह कैसी नीति?’
व्यंग्यात्मक शैली में उन्होंने कहा कि यदि सीमा पार से लगातार हिंसा और आतंकी घटनाएं होती रहें और जवाब में केवल खुले पत्र जारी किए जाएं, तो इससे स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकती।
उन्होंने कहा कि जब तक आतंकवाद के खिलाफ ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक केवल अपीलों के माध्यम से सकारात्मक परिणाम की अपेक्षा करना कठिन है।
‘राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत नीति से सुनिश्चित होती है’
प्रमोद त्यागी ने कहा कि देश की सुरक्षा किसी हस्ताक्षर अभियान या भावनात्मक अपील से नहीं, बल्कि मजबूत राष्ट्रीय नीति, स्पष्ट निर्णय और आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति से सुनिश्चित होती है।
उन्होंने कहा कि देश की जनता राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर स्पष्ट और दृढ़ रुख की अपेक्षा करती है।
ओपन लेटर में क्या उठाई गई हैं प्रमुख मांगें?
हाल ही में भारत और पाकिस्तान की 117 हस्तियों द्वारा दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों—नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ—को एक खुला पत्र भेजा गया है। यह पहल नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर पीस एंड प्रगति के प्रमुख ओ.पी. शाह के नेतृत्व में की गई बताई गई है।
पत्र में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता फिर से शुरू करने, जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुद्दों पर संवाद बढ़ाने, व्यापार और पर्यटन के लिए वाघा सीमा को सक्रिय करने तथा सीमा पर तनाव कम करने जैसे सुझाव दिए गए हैं।
बताया गया है कि इस पहल पर भारत के 61 और पाकिस्तान के 56 नागरिकों ने हस्ताक्षर किए हैं। भारतीय हस्ताक्षरकर्ताओं में फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, मीरवाइज उमर फारूक, मनोज झा और पूर्व रॉ (R&AW) प्रमुख ए.एस. दुलत सहित कई अन्य प्रमुख नाम शामिल बताए गए हैं।
ओपन लेटर को लेकर क्यों छिड़ा विवाद?
यह पहल ऐसे समय सामने आई है जब हाल के आतंकी घटनाक्रमों के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर देश में संवेदनशील माहौल बना हुआ है।
इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ इसे शांति और संवाद की पहल बता रहे हैं, जबकि अन्य का कहना है कि आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई के बिना बातचीत की मांग उचित नहीं है।
इसी संदर्भ में प्रमोद त्यागी ने भी अपना पक्ष रखते हुए कहा कि आतंकवाद पर निर्णायक कार्रवाई से पहले इस प्रकार की पहल आम जनता को राजनीतिक संदेश अधिक और व्यावहारिक समाधान कम प्रतीत होती है।

