नये कृषि कानून पर गतिरोध जारी, ना किसान माने ना सरकार ,पॉस्चरिंग का दौर जारी
नए कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसानों के आंदोलन को महीना भर होने को आया है। केंद्र सरकार से कई दौर की बातचीत के बावजूद गतिरोध दूर नहीं हो सका है।
दोनों तरफ से पॉस्चरिंग का दौर जारी है। मंगलवार को कृषि भवन में कुछ किसान संगठनों ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाकात की। बाद में तोमर ने कहा कि उत्तर प्रदेश के कुछ किसान नेताओं ने मिलकर नए कानूनों को अपना समर्थन दिया है।
तोमर ने दावा किया कि इन नेताओं ने कहा कि कानूनों में कोई संशोधन नहीं होना चाहिए। दूसरी तरफ, सिंघु बॉर्डर पर किसान नेता कुलवंत सिंह संधू ने कहा कि तीनों कानूनों को वापस लिया जाना प्रमुख मांग है
इससे समझौता नहीं होगा। किसान संगठनों ने गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में भारत आ रहे ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के दौरे को रोकने की कोशिशें शुरू कर दी हैं।
सभी किसान भाइयों और बहनों से मेरा आग्रह !
"सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास" के मंत्र पर चलते हुए प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी के नेतृत्व में हमारी सरकार ने बिना भेदभाव सभी का हित करने का प्रयास किया है। विगत 6 वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है।#ModiWithFarmers pic.twitter.com/Ty6GchESUG
— Narendra Singh Tomar (@nstomar) December 17, 2020
इन सबके बीच, सोमवार को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने एक रिपोर्ट में जारी गतिरोध दूर करने के लिए पांच सूत्रीय रणनीति सुझाई है।
दाम की गारंटी के बजाय मात्रा की गारंटी दी जाए
रिपोर्ट में सुझाया गया है कि सरकार कीमत की गारंटी के लिए एमएसपी की जगह न्यूनतम 5 साल के लिए मात्रा की गारंटी का क्लॉज जोड़ सकती है।
इससे यह पक्का हो जाएगा कि फसलों के उत्पादन और खरीद का प्रतिशत पिछले साल के प्रतिशत के कम से कम बराबर तो रहे ही। बैंक ने पंजाब, हरियाणा समेत कई राज्यों में गेहूं और चावल की खरीद के आंकड़ों के आधार पर यह सुझाव दिया है।
धान की खरीद में पंजाब सबसे आगे
खरीफ फसलों की खरीद का डेटा देखें तो पंजाब ने जबर्दस्त उछाल देखा है। धान की खेती में यह तीसरे नंबर पर है लेकिन खरीद में सबसे आगे। जबकि ज्यादा उत्पादन करने वाले राज्यों में खरीद बेहद कम रही है।
हालांकि पंजाब, हरियाणा और कुछ अन्य राज्यों में अधिकतर सरकारी खरीद केंद्र नोटिफाइड मंडियों के भीतर स्थित हैं। किसानों को डर है कि इन मंडियों के बाहर टैक्स-फ्री ट्रेड को बढ़ावा देने से ये बाजार बेकार हो जाएंगे।
