Health Care: मूत्रमार्ग का संक्रमण (Urinary tract infection) और होम्योपैथिक
Health Care मूत्रमार्ग का संक्रमण (Urinary tract infection) महिलाओं में होने वाली एक सामान्य बीमारी है और लो ग्रेड फीवर का मुख्य कारण है , लगभग 50 प्रतिशत महिलायें अपने जीवन काल में कभी न कभी इस रोग से ग्रसित होती है , पुरुषों में यह संक्रमण कम ही मिलता है , यह मुख्यतः बैक्ट्रिया जनित रोग है
निम्न बैक्ट्रिया इस रोग के प्रसार में सहायक होते हैं-
1. ईन्कोलाई
2. प्रोटीयस
3. स्टेप्टोकॉक्की
4. सिडोमोनस
5. स्टेफायलॉकोक्सि एपि
यह बैक्ट्रिया उचित स्वच्छता के अभाव में या तो मलद्वार से या मैथुन क्रिया के समय मूत्राशय तक पहुंचते हैं व अपनी संख्या में वृद्धि करके मूत्रमार्ग से मूत्राशय तक पहुंचते हैं व रोग से उत्पन्न करते हैं , मूत्रमार्ग की लंबाई कम होने व प्रोस्टेटिक श्राव जिसमें इन बैक्ट्रिया को मारने की क्षमता होती हैं के अभाव में ये (Urinary tract infection) रोग महिलाओं में होने की संभावना अधिक होती है .
( 1 ) मूत्राशय या मूत्रमार्ग की पथरी .
( 2 ) मूत्रमार्ग में सिकुड़न होना .
( 3 ) नर्वस डिस्ऑडर जैसे मल्टीपल सेलेरोसिस डायबेटिक न्यूरोपैथी
( 4 ) कैथेराजेशन .
( 5 ) मेनोपॉज के बाद मूत्रमार्ग का संकुचन होना .
( 6 ) डायबेटिक मेलिटस , लक्षण : ( 1 ) जाड़े व कंपकंपी के साथ बुखार आना .
( 2 ) बार – बार मूत्र त्याग की इच्छा होती है .
( 3 ) मूत्र त्याग करते समय मूत्रमार्ग में दर्द या जलन का होना ,
( 4 ) मूत्र त्याग की इच्छा पर नियंत्रण नहीं रहता . ( 5 ) मूत्राशय में सूजन के कारण पेडू में दर्द रहता है
( 6 ) मूत्र का रंग धुंधला सफेद होता है व मूत्र गंधयुक्त होता है .
( 7 ) मूत्र में रक्त कोशिकायें उपस्थित होती है , परीक्षण : ( 1 ) पेशाब का कल्चर
( 2 ) टी.एल.सी. डी . एल . सी . न्युट्रोफिल काउण्ट
( 3 ) ग्राम स्टेनिंग .
Urinary tract infection- बचाव और उपाय :
( 1 ) दिन में 2 लीटर से अधिक पानी पीना चाहिए .
( 2 ) मूत्र त्याग की इच्छा होने पर मूत्र को ज्यादा देर तक रोकना नहीं चाहिए ,
( 3 ) मूत्रमार्ग की स्वच्छता का उचित ध्यान रखना चाहिए .
होमियोपैथिक उपचार लक्षणों के आधार पर निम्न औषधियां इस रोग के उपचार में प्रभावी होती है
चिनिमम आर्स : – रोगी का निश्चित अंतराल पर बुखार आता है व थकावट रहती है . बुखाई के साथ जाड़े का अनुभव होता है
जेल्सिमियम : – इस औषधि का मरीज अत्यधिक थकावट का अनुभव करता है . रोगी को अत्यधिक कंपकंपी होती है व जाड़ा लगता है . मरीज हमेशा आराम करना चाहता है व साथ में चक्कर भी आता है . प्यास नहीं लगती है , मरीज स्पाइन में ऊपर जाती लहर की तरह जाड़े का अनुभव करता है . इसके आलावे लक्षणों के आधार पर एकोनाइट , आर्सेनिक , सिनकोना , फॉस्फोरस , रस टॉक्स , बरबेरिस वल्गेरिस , कैव्यरिस , पाइरोजिनम आदि औषधिंयां भी प्रभावी होती हैं ।

