दिल से

E20 पेट्रोल पर सरकार कहती है ‘भरोसा रखिए’, आम आदमी पूछ रहा- इंजन बिगड़ा तो बिल कौन भरेगा?

भारत बदल रहा है। तेजी से बदल रहा है। इतनी तेजी से कि कई बार आम आदमी को बदलाव समझ में आने से पहले ही बताया जाता है कि वह उसके हित में है।  अब E20 Petrol को ही ले लीजिए। सरकार कहती है कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने से देश को फायदा होगा। कच्चे तेल का आयात घटेगा, विदेशी मुद्रा बचेगी, किसानों को लाभ होगा, प्रदूषण कम होगा और भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा।

बहुत अच्छी बात है। देश का फायदा हो, किसान खुश हों, विदेशी मुद्रा बचे और प्रदूषण कम हो—भला इसका विरोध कौन करेगा? समस्या बस इतनी सी है कि इन तमाम फायदों के बीच आम आदमी अपनी कार की चाबी हाथ में लेकर एक मासूम सवाल पूछ रहा है—

“साहब, सबका फायदा समझ गया… लेकिन अगर मेरी गाड़ी का इंजन बिगड़ा तो पैसा कौन देगा?”

और यहीं से E20 की असली कहानी शुरू होती है।

Petrolसरकार को पूरा भरोसा है, कंपनियों को भी भरोसा है… बस ग्राहक थोड़ा घबराया हुआ है

सरकार कहती है कि E20 सुरक्षित है।

वाहन निर्माता कंपनियां कहती हैं कि नए वाहन E20 के अनुरूप तैयार किए जा रहे हैं।

नीति विशेषज्ञ बताते हैं कि इससे देश को दीर्घकालिक लाभ होगा।

अर्थशास्त्री विदेशी मुद्रा की बचत समझाते हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञ प्रदूषण कम होने की संभावना बताते हैं।

सबके पास आंकड़े हैं। रिपोर्ट हैं। प्रस्तुतियां हैं। नीतियां हैं।

बस एक आम आदमी है, जिसके पास कार की EMI है।

वह सुबह उठता है, मोबाइल खोलता है और एक वीडियो देखता है—E20 से माइलेज घट सकता है।

दूसरा वीडियो बताता है—कुछ पुराने वाहनों के पुर्जों पर असर पड़ सकता है।

तीसरा व्यक्ति कहता है—कुछ नहीं होगा, बेफिक्र होकर गाड़ी चलाइए।

चौथा कहता है—भाई, अभी तो कुछ नहीं होगा, पांच साल बाद पता चलेगा।

बेचारा ग्राहक फोन बंद करता है और सोचता है—

“पेट्रोल भरवाऊं या पहले मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री करूं?”

देशहित बहुत जरूरी है, लेकिन कार की EMI भी राष्ट्रविरोधी नहीं है

हमारे यहां नीतियों पर सवाल पूछने की एक दिलचस्प समस्या है।

यदि कोई व्यक्ति कह दे कि E20 को लेकर उसके मन में कुछ आशंकाएं हैं, तो कई लोग तुरंत समझाने लगते हैं कि इससे देश का फायदा होगा।

बिल्कुल होगा।

लेकिन सवाल देश के फायदे का विरोध नहीं है।

सवाल यह है कि संभावित जोखिम का बोझ किसके कंधे पर होगा?

एक सामान्य मध्यमवर्गीय व्यक्ति पांच, सात या कभी-कभी नौ साल तक कार की EMI भरता है।

डाउन पेमेंट के लिए बचत करता है।

बैंक से लोन लेता है।

बीमा कराता है।

सर्विस कराता है।

पेट्रोल भराता है।

टोल देता है।

पार्किंग का पैसा देता है।

और इन सबके बाद यदि उसके मन में यह सवाल उठ जाए कि नई ईंधन नीति का उसकी गाड़ी पर दीर्घकालिक प्रभाव क्या होगा, तो उसे तकनीक-विरोधी घोषित करने से समस्या हल नहीं होगी।

क्योंकि कार खरीदने वाला हर व्यक्ति अरबपति नहीं होता।

बहुत से परिवारों के लिए आठ-दस लाख रुपये की कार उनकी जिंदगी की दूसरी सबसे बड़ी खरीद होती है—पहली शायद घर हो।

ऐसे में उसकी चिंता स्वाभाविक है।

लाभ देश का, नीति सरकार की और जोखिम… ग्राहक जी, आपका स्वागत है!

मान लीजिए सरकार को E20 पर पूरा भरोसा है।

बहुत अच्छी बात।

वाहन निर्माता कंपनियों को भी पूरा भरोसा है।

और भी अच्छी बात।

तो फिर एक छोटा सा सवाल है।

अगर भविष्य में किसी वाहन मालिक को ईंधन से संबंधित कोई गंभीर तकनीकी समस्या होती है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

सरकार?

तेल कंपनी?

वाहन निर्माता?

डीलर?

बीमा कंपनी?

सर्विस सेंटर?

या अंत में वही ऐतिहासिक उत्तर मिलेगा—

“यह मामला वारंटी की शर्तों के अंतर्गत नहीं आता।”

आम आदमी इसी एक वाक्य से डरता है।

क्योंकि भारत का मध्यम वर्ग नीति की प्रेस कॉन्फ्रेंस से कम और सर्विस सेंटर के बिल से ज्यादा परिचित है।

उसे पता है कि गाड़ी खरीदते समय मुस्कुराकर चाबी देने वाले लोग और इंजन में समस्या आने के बाद फाइल देखने वाले लोग अक्सर अलग-अलग भाषा बोलते हैं।

E20 सुरक्षित है तो शानदार, फिर लिखित गारंटी देने में समस्या क्या है?

यदि E20 पूरी तरह सुरक्षित है, तो सरकार और वाहन निर्माता कंपनियों को उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ाने के लिए और मजबूत कदम उठाने चाहिए।

लंबी अवधि के परीक्षणों के परिणाम सार्वजनिक किए जाएं।

अलग-अलग प्रकार के इंजनों पर हुए परीक्षणों की जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध कराई जाए।

पुराने वाहनों और नए वाहनों के बीच अंतर स्पष्ट किया जाए।

माइलेज पर संभावित प्रभाव को बिना घुमाए-फिराए बताया जाए।

वाहन मालिकों को यह समझाया जाए कि कौन सा मॉडल E20 के लिए पूरी तरह अनुकूल है और किस वाहन में अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता हो सकती है।

और सबसे महत्वपूर्ण—

यदि ईंधन से जुड़ी किसी प्रमाणित तकनीकी समस्या के कारण उपभोक्ता को नुकसान होता है, तो उसके संरक्षण की स्पष्ट व्यवस्था क्या होगी?

यह जानकारी भी जनता को मिलनी चाहिए।

क्योंकि “आप हम पर भरोसा कीजिए” और “हम आपके नुकसान की जिम्मेदारी लेंगे”—इन दोनों वाक्यों में जमीन-आसमान का अंतर है।

आम आदमी को वैज्ञानिक रिपोर्ट नहीं, सीधा जवाब चाहिए

सरकार चाहे तो E20 पर पांच सौ पन्नों की रिपोर्ट प्रकाशित कर सकती है।

ऑटोमोबाइल कंपनियां तकनीकी शब्दों से भरी प्रस्तुतियां जारी कर सकती हैं।

विशेषज्ञ इंजन कम्प्रेशन, फ्यूल सिस्टम कम्पैटिबिलिटी और एथेनॉल ब्लेंडिंग पर घंटों चर्चा कर सकते हैं।

लेकिन एक सामान्य वाहन मालिक का सवाल बहुत छोटा है।

“मेरी गाड़ी सुरक्षित है या नहीं?”

और दूसरा सवाल उससे भी छोटा है।

“नुकसान हुआ तो जिम्मेदार कौन?”

यदि इन दो सवालों का जवाब स्पष्ट, लिखित और विश्वसनीय रूप से मिल जाए, तो शायद सोशल मीडिया की आधी बहस अपने आप समाप्त हो जाए।

लेकिन जब स्पष्ट उत्तर की जगह केवल आश्वासन मिलता है, तो संदेह पैदा होता है।

और संदेह की सबसे अच्छी खाद होती है—अधूरी जानकारी।

YouTube यूनिवर्सिटी बनाम सरकारी प्रेस रिलीज, बीच में फंसा बेचारा ग्राहक

आज सूचना का दौर है।

और सूचना इतनी ज्यादा है कि सही सूचना ढूंढना खुद एक पूर्णकालिक नौकरी बन चुका है।

एक तरफ सरकारी बयान हैं।

दूसरी तरफ वाहन निर्माता कंपनियों के दावे हैं।

तीसरी तरफ ऑटोमोबाइल विशेषज्ञ हैं।

चौथी तरफ मैकेनिक हैं।

पांचवीं तरफ YouTube है।

और छठी तरफ वह पड़ोसी है, जिसे दुनिया के हर विषय की जानकारी है।

वह सुबह विदेश नीति समझाता है।

दोपहर में शेयर बाजार।

शाम को क्रिकेट टीम चुनता है।

और रात में E20 से इंजन पर पड़ने वाले प्रभाव की विशेषज्ञ समीक्षा करता है।

आम आदमी आखिर भरोसा करे तो किस पर?

यही कारण है कि सरकार की जिम्मेदारी केवल नीति लागू करना नहीं, बल्कि सूचना के शोर के बीच विश्वसनीय और पारदर्शी व्यवस्था बनाना भी है।

‘अफवाहों पर ध्यान न दें’ कहना सबसे आसान सरकारी समाधान है

जब किसी नई नीति को लेकर सवाल उठते हैं, तो सबसे आसान प्रतिक्रिया होती है—

“भ्रामक सूचनाओं पर ध्यान न दें।”

ठीक है।

नहीं देंगे।

लेकिन फिर सही सूचना कहां मिलेगी?

क्या प्रत्येक वाहन मॉडल की E20 अनुकूलता की कोई आसानी से उपलब्ध आधिकारिक सूची है?

क्या आम ग्राहक वाहन का मॉडल और निर्माण वर्ष डालकर पता कर सकता है कि उसकी गाड़ी E20 के लिए कितनी अनुकूल है?

क्या संभावित माइलेज परिवर्तन को स्पष्ट रूप से बताया गया है?

क्या पुराने वाहनों के मालिकों के लिए अलग दिशानिर्देश हैं?

क्या किसी विवाद की स्थिति में स्वतंत्र तकनीकी जांच की व्यवस्था है?

यदि इन सभी सवालों के स्पष्ट उत्तर आसानी से उपलब्ध हों, तो अफवाहों की दुकान अपने आप बंद होने लगेगी।

जनता को चुप कराने से भरोसा नहीं बनता।

जनता को जानकारी देने से बनता है।

कार कोई मोबाइल फोन नहीं कि दो साल बाद नया मॉडल खरीद लें

नीतियां बनाते समय यह समझना जरूरी है कि भारत में कार का इस्तेमाल किस तरह होता है।

एक सामान्य भारतीय परिवार हर दो साल में कार नहीं बदलता।

वह एक वाहन खरीदता है और आठ, दस, बारह साल तक चलाने की उम्मीद करता है।

कई लोग पुरानी कार खरीदते हैं।

कई परिवारों के पास ऐसे वाहन हैं, जिन्हें E20 के व्यापक इस्तेमाल से काफी पहले डिजाइन किया गया था।

ऐसे लोगों के सवालों का क्या?

क्या उन्हें अपनी कार बेच देनी चाहिए?

क्या वे बिना चिंता E20 इस्तेमाल कर सकते हैं?

क्या किसी अतिरिक्त रखरखाव की आवश्यकता होगी?

क्या भविष्य में कोई तकनीकी समस्या आने की संभावना है?

इन सवालों के जवाब केवल “देश आगे बढ़ रहा है” कहकर नहीं दिए जा सकते।

देश निश्चित रूप से आगे बढ़ना चाहिए।

लेकिन नागरिक की कार रास्ते में बंद नहीं होनी चाहिए।

माइलेज कम हुआ तो पर्यावरण खुश होगा, लेकिन ग्राहक का बजट?

E20 को लेकर माइलेज की चर्चा भी लगातार होती रही है।

यदि किसी ईंधन के उपयोग से माइलेज में मामूली अंतर भी आता है, तो व्यक्तिगत स्तर पर वह छोटा दिखाई दे सकता है।

लेकिन रोजाना वाहन चलाने वाले व्यक्ति के लिए सालभर का अतिरिक्त ईंधन खर्च महत्वपूर्ण हो सकता है।

मध्यम वर्ग का बजट प्रतिशत में नहीं चलता।

वह रुपये में चलता है।

स्कूल फीस।

होम लोन।

कार EMI।

बिजली बिल।

किराना।

बीमा।

मेडिकल खर्च।

और फिर पेट्रोल।

ऐसे में यदि किसी नई नीति का उपभोक्ता के मासिक खर्च पर प्रभाव पड़ता है, तो उसकी स्पष्ट जानकारी देना सरकार और संबंधित उद्योग की जिम्मेदारी होनी चाहिए।

किसान को फायदा होना चाहिए, लेकिन ग्राहक को सवाल पूछने का अधिकार भी होना चाहिए

E20 के समर्थन में एक महत्वपूर्ण तर्क किसानों की आय से जुड़ा है।

एथेनॉल उत्पादन बढ़ने से कृषि क्षेत्र को आर्थिक अवसर मिल सकते हैं।

यह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

भारत के किसानों की आय बढ़नी चाहिए।

ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम होनी चाहिए।

देश की विदेशी मुद्रा बचनी चाहिए।

लेकिन इन सभी उद्देश्यों का समर्थन करने का अर्थ यह नहीं कि उपभोक्ता अपने सवाल पूछना बंद कर दे।

एक अच्छी नीति वह नहीं होती, जिसमें एक वर्ग के हित के लिए दूसरे वर्ग की आशंकाओं को नजरअंदाज कर दिया जाए।

अच्छी नीति वह होती है, जिसमें लाभ व्यापक हों और संभावित जोखिमों के लिए स्पष्ट सुरक्षा व्यवस्था मौजूद हो।

सरकार भरोसा मांग रही है, जनता जवाबदेही मांग रही है

असल समस्या E20 नहीं है।

असल समस्या भरोसे की है।

सरकार कहती है—हम पर विश्वास कीजिए।

जनता कहती है—जरूर करेंगे, बस कुछ सवालों के जवाब दे दीजिए।

सरकार कहती है—यह देशहित में है।

जनता कहती है—बहुत अच्छी बात है, लेकिन नुकसान हुआ तो क्या होगा?

कंपनियां कहती हैं—वाहन अनुकूल हैं।

ग्राहक पूछता है—लिखकर देंगे?

और यहीं बातचीत थोड़ी असहज हो जाती है।

क्योंकि भरोसा भाषण से नहीं बनता।

भरोसा तब बनता है, जब जिम्मेदारी भी उसी आत्मविश्वास के साथ स्वीकार की जाए, जिस आत्मविश्वास से नीति के फायदे बताए जाते हैं।

नई तकनीक का स्वागत है, लेकिन आम आदमी को प्रयोगशाला का चूहा मत समझिए

भारत को नई तकनीक अपनानी चाहिए।

स्वच्छ ईंधन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

कच्चे तेल पर निर्भरता कम करनी चाहिए।

एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देना चाहिए।

इन उद्देश्यों पर सवाल नहीं है।

लेकिन नई तकनीक को अपनाने की प्रक्रिया में उपभोक्ता संरक्षण सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए।

आम आदमी को ऐसा महसूस नहीं होना चाहिए कि नीति सफल हुई तो सरकार की उपलब्धि और समस्या आई तो उसकी निजी जिम्मेदारी।

यानी—

फायदा हुआ तो प्रेस कॉन्फ्रेंस।

नुकसान हुआ तो सर्विस सेंटर।

यह व्यवस्था भरोसा पैदा नहीं करती।

एक सरल समाधान है- सरकार जोखिम में भी हिस्सेदार बने

यदि सरकार वास्तव में E20 को लेकर जनता का विश्वास जीतना चाहती है, तो एक स्पष्ट उपभोक्ता संरक्षण व्यवस्था बनाई जा सकती है।

स्वतंत्र तकनीकी शिकायत तंत्र हो।

ईंधन से जुड़ी संभावित तकनीकी समस्याओं की निष्पक्ष जांच हो।

वाहन निर्माता और ईंधन कंपनियों की जिम्मेदारियां स्पष्ट हों।

पुराने वाहनों के लिए अलग दिशानिर्देश जारी किए जाएं।

दीर्घकालिक परीक्षणों का डेटा सार्वजनिक हो।

और यदि किसी मामले में यह प्रमाणित हो जाए कि निर्धारित ईंधन के कारण उपभोक्ता को गंभीर नुकसान हुआ है, तो मुआवजे या मरम्मत की स्पष्ट व्यवस्था हो।

फिर देखिए, भरोसा कैसे बढ़ता है।

क्योंकि आम आदमी नई तकनीक का विरोधी नहीं है।

वह केवल यह जानना चाहता है कि मुश्किल आने पर वह अकेला तो नहीं छोड़ दिया जाएगा।

E20 भविष्य का ईंधन हो सकता है, लेकिन भरोसा आज चाहिए

भारत का भविष्य स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ा है।

एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल उस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

लेकिन किसी भी राष्ट्रीय नीति की वास्तविक सफलता केवल आंकड़ों में नहीं मापी जाती।

वह इस बात से भी तय होती है कि देश का सामान्य नागरिक उस नीति को कितने विश्वास के साथ स्वीकार करता है।

यदि लाखों वाहन मालिकों के मन में सवाल हैं, तो उन सवालों का उत्तर देना सरकार की कमजोरी नहीं होगी।

बल्कि यही मजबूत लोकतंत्र की पहचान होगी।

जनता को यह मत समझाइए कि उसे डरना नहीं चाहिए।

उसे वह व्यवस्था दीजिए, जिसके बाद डरने की जरूरत ही न पड़े।

आखिर सवाल सिर्फ पेट्रोल का नहीं, उस व्यक्ति की जीवनभर की कमाई का है

एक व्यक्ति दस लाख की कार खरीदता है।

सात साल EMI देता है।

हर महीने पेट्रोल भराता है।

समय पर सर्विस कराता है।

बीमा कराता है।

टैक्स देता है।

और फिर सरकार उससे कहती है—

“नई व्यवस्था पर भरोसा रखिए।”

वह भरोसा रखना चाहता है।

सचमुच रखना चाहता है।

बस उसकी एक छोटी सी शर्त है।

यदि सरकार, तेल कंपनियां और वाहन निर्माता E20 के लाभों पर इतना विश्वास रखते हैं, तो संभावित नुकसान की जिम्मेदारी तय करने में भी उतना ही आत्मविश्वास क्यों नहीं दिखाया जाता?

यही सवाल E20 की पूरी बहस के केंद्र में है।

E20 पेट्रोल देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता, किसानों की आय और पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, लेकिन किसी भी नीति की सबसे मजबूत नींव जनता का विश्वास होता है। आम आदमी नई तकनीक का विरोध नहीं कर रहा, वह केवल इतना पूछ रहा है कि यदि सब कुछ सुरक्षित है तो पारदर्शी परीक्षण, स्पष्ट दिशानिर्देश और मजबूत उपभोक्ता संरक्षण व्यवस्था देने में हिचक कैसी? क्योंकि नीति सरकार बनाती है, ईंधन कंपनियां बेचती हैं, वाहन कंपनियां कार बनाती हैं—लेकिन वर्षों की कमाई लगाकर उस कार को खरीदने वाला नागरिक अकेला क्यों जोखिम उठाए? देशहित जरूरी है, ऊर्जा आत्मनिर्भरता भी जरूरी है, लेकिन उस आम आदमी की चिंता भी कम महत्वपूर्ण नहीं, जो पेट्रोल पंप पर टंकी भरवाते समय आजकल ईंधन से ज्यादा भरोसा तलाश रहा है।

 

Shashank Goel

शशांक गोयल शिक्षा की दृष्टि से मैकेनिकल इंजीनियर हैं लेकिन फिर भी एक संवेदनशील कवि, रचनात्मक कंटेंट राइटर और लोकप्रिय लेखक भी हैं। उनकी कविताएं, लेख और प्रेरक विचार प्रबुद्ध पाठकों और युवा वर्ग के बीच विशेष रूप से सराहे जाते हैं।

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