RaeBareli में साइबर ठगी का बड़ा खेल बेनकाब! फर्जी फर्म, GST और बैंक खातों से करोड़ों की रकम घुमाने वाला गिरोह पकड़ा, 8 गिरफ्तार
News-Desk
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आठ गिरफ्तार, आधार कार्ड, इंदौर, उत्तर प्रदेश साइबर क्राइम, एटीएम कार्ड, ऑनलाइन ठगी, पैन कार्ड, फर्जी जीएसटी, फर्जी फर्म, फर्जी बैंक खाता, बांदा, बैंक चेक, रायबरेली, रायबरेली क्राइम न्यूज, रायबरेली न्यूज, रायबरेली पुलिस, साइबर क्राइम, साइबर क्राइम पुलिस, साइबर ठगी, साइबर फ्रॉड गैंगRaeBareli Cyber Fraud के खिलाफ कार्रवाई में रायबरेली पुलिस को बड़ी सफलता मिलने का दावा किया गया है। कोतवाली नगर और साइबर क्राइम पुलिस की संयुक्त टीम ने कथित तौर पर ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो फर्जी फर्मों के नाम पर बैंक खाते खुलवाकर उनमें साइबर ठगी से हासिल रकम मंगाता था और फिर उसे अलग-अलग खातों के जरिए आगे स्थानांतरित करने के बाद एटीएम से निकालकर आपस में बांटता था।
पुलिस ने इस मामले में कुल आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए आरोपियों में चार मध्य प्रदेश के इंदौर, तीन रायबरेली और एक बांदा का निवासी बताया गया है। पुलिस के अनुसार आरोपियों के कब्जे से बड़ी संख्या में मोबाइल फोन, बैंक चेक, एटीएम कार्ड और बैंकिंग से जुड़े अन्य दस्तावेज बरामद किए गए हैं।
इस कार्रवाई ने साइबर ठगी के उस तरीके पर भी रोशनी डाली है जिसमें अपराधी सीधे पीड़ित के बैंक खाते से पैसा निकालने के बजाय कथित तौर पर कई परतों वाले बैंकिंग नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं। फर्जी फर्म, GST पंजीकरण और बैंक खातों के जरिए ठगी की रकम को अलग-अलग खातों में घुमाने के बाद नकदी में बदलने की कोशिश की जाती थी।
पुलिस अब गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के आधार पर गिरोह के दूसरे सदस्यों, फर्जी फर्मों के वास्तविक इस्तेमाल, बैंक खातों के नेटवर्क और साइबर ठगी से जुड़े अन्य संभावित मामलों की जानकारी जुटा रही है।
राजघाट मोड़ के पास पुलिस ने आठ आरोपियों को दबोचा
पुलिस अधीक्षक रवि कुमार के निर्देश पर पुलिस टीम ने कार्रवाई करते हुए राजघाट मोड़ के पास से आरोपियों को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों की पहचान बांदा के कटरा निवासी आनंद मिश्रा, रायबरेली शहर निवासी प्रभाकर श्रीवास्तव, रायबरेली के अलीनगर निवासी सईद मो. आजम, सत्यनगर निवासी मो. अकरम तथा मध्य प्रदेश के इंदौर निवासी आकाश गौड़, जतिन सेन, बब्लू हिरवे और सुरेंद्र सिंह के रूप में हुई है।
पुलिस का कहना है कि आरोपियों से पूछताछ में साइबर ठगी की रकम के लेनदेन के लिए फर्जी फर्म और बैंक खातों के इस्तेमाल की जानकारी सामने आई है।
गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से बरामद दस्तावेजों और बैंकिंग सामग्री को भी जांच का हिस्सा बनाया है। अब इन दस्तावेजों के आधार पर यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि कितनी फर्में बनाई गईं, कितने बैंक खाते खुलवाए गए और उनमें कितनी रकम का लेनदेन हुआ।
फर्जी फर्म बनाकर शुरू होता था कथित साइबर ठगी के पैसे का खेल
पुलिस के मुताबिक गिरोह का कथित तरीका काफी व्यवस्थित था। पहले लोगों के नाम पर फर्जी फर्म पंजीकृत कराई जाती थी। इसके बाद संबंधित फर्म के नाम पर GST पंजीकरण कराया जाता और बैंक खाता खुलवाया जाता था।
एक बार बैंक खाता तैयार हो जाने के बाद साइबर ठगी से हासिल रकम कथित तौर पर इन खातों में मंगाई जाती थी। इसके बाद रकम को सीधे निकालने के बजाय कई अन्य बैंक खातों में ट्रांसफर किया जाता था।
इस तरह रकम को कई स्तरों पर घुमाने के बाद एटीएम के जरिए नकद निकालने का आरोप है।
साइबर अपराध की दुनिया में पैसे को कई खातों के जरिए घुमाने का उद्देश्य अक्सर लेनदेन की सीधी कड़ी को जटिल बनाना होता है। हालांकि इस मामले में वास्तव में कितनी रकम का लेनदेन हुआ और कितने पीड़ितों से जुड़ा पैसा इन खातों में आया, इसका पता पुलिस की विस्तृत जांच के बाद ही चलेगा।
आधार और पैन जैसे दस्तावेजों का इस्तेमाल करने का आरोप
पुलिस के अनुसार फर्जी फर्म और बैंक खाते तैयार कराने के लिए आरोपियों ने आधार कार्ड, पैन कार्ड और अन्य दस्तावेजों का इस्तेमाल किया।
यह पहलू जांच के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी व्यक्ति की पहचान संबंधी जानकारी का इस्तेमाल करके उसके नाम पर फर्म या बैंक खाता खुलवाया जाता है तो वास्तविक लाभार्थी तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर सकती है कि जिन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया, वे वास्तविक खाताधारकों के थे या किसी अन्य तरीके से हासिल किए गए थे। साथ ही यह भी जांच का विषय होगा कि फर्जी फर्मों के नाम और GST पंजीकरण किस तरह तैयार किए गए।
बरामद हुए दर्जनों चेक और कई एटीएम कार्ड
पुलिस ने आरोपियों के पास से बड़ी मात्रा में बैंकिंग सामग्री बरामद किए जाने की जानकारी दी है। इनमें सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की 16 चेक और उत्कर्ष स्मॉल फाइनेंस बैंक की 56 चेक शामिल हैं।
इसके अलावा इंडियन बैंक का खाता खोलने का भरा हुआ फॉर्म भी बरामद किए जाने की बात पुलिस ने कही है। पुलिस के अनुसार 34 बैंक चेक ऐसे भी मिले हैं, जिन पर हस्ताक्षर और मुहर लगी हुई थी।
विभिन्न बैंकों के अन्य चेक और एटीएम कार्ड भी बरामद किए गए हैं।
इतनी बड़ी संख्या में बैंकिंग दस्तावेज मिलने के बाद पुलिस के सामने अब इन सभी खातों और चेक की गतिविधियों को खंगालने का महत्वपूर्ण काम होगा। बैंकिंग रिकॉर्ड से यह पता लगाया जा सकता है कि इन खातों में कब-कब पैसा आया, कहां भेजा गया और किन माध्यमों से निकाला गया।
एटीएम से नकदी निकालकर आपस में बांटने का आरोप
सीओ सिटी आशीष निगम के अनुसार आरोपी फर्जी फर्म और बैंक खाते खुलवाकर साइबर ठगी की रकम का लेनदेन करते थे। पुलिस के मुताबिक रकम को अलग-अलग खातों में स्थानांतरित करने के बाद एटीएम से नकदी निकाली जाती थी।
इसके बाद कथित तौर पर गिरोह के सदस्य रकम का आपस में बंटवारा करते थे।
यह तरीका जांच एजेंसियों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल बैंकिंग के माध्यम से रकम आने के बाद उसका नकदी में बदलना पूरे नेटवर्क की अगली कड़ी को उजागर कर सकता है।
ATM से निकासी की तारीख, समय और स्थान की जानकारी भी जांच में महत्वपूर्ण हो सकती है। बैंकिंग रिकॉर्ड और उपलब्ध CCTV फुटेज के माध्यम से पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर सकती है कि रकम निकालने के लिए वास्तव में कौन लोग ATM तक पहुंचे थे।
इंदौर, रायबरेली और बांदा तक फैला नेटवर्क
गिरफ्तार आरोपियों की भौगोलिक पृष्ठभूमि भी इस मामले को महत्वपूर्ण बनाती है। पुलिस के अनुसार चार आरोपी इंदौर के रहने वाले हैं, तीन रायबरेली से हैं और एक बांदा का निवासी है।
इससे पुलिस को आशंका है कि गिरोह का नेटवर्क एक ही जिले तक सीमित नहीं हो सकता। अलग-अलग शहरों में रहने वाले लोगों के बीच बैंक खातों, फर्मों और दस्तावेजों को लेकर समन्वय की जांच की जा रही है।
हालांकि यह अभी जांच का विषय है कि सभी गिरफ्तार आरोपी किस स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े थे और गिरोह में उनकी व्यक्तिगत भूमिकाएं क्या थीं।
जिम संचालक मो. अकरम की भूमिका भी जांच के घेरे में
गिरफ्तार आरोपियों में रायबरेली के सत्यनगर निवासी मो. अकरम का नाम भी शामिल है। पुलिस के अनुसार अकरम जिम संचालक है।
पुलिस उसके जिम की भी तलाशी ले रही है और वहां आने-जाने वाले लोगों के बारे में जानकारी जुटाई जा रही है।
जांच एजेंसियों के लिए यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि जिम केवल अकरम का व्यवसायिक प्रतिष्ठान था या वहां कथित गिरोह के अन्य सदस्यों की बैठक अथवा संपर्क भी होता था।
हालांकि किसी व्यक्ति के जिम चलाने मात्र से उसका अपराध से जुड़ाव साबित नहीं होता। इस मामले में अकरम की वास्तविक भूमिका पुलिस की जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही स्पष्ट होगी।
जिम आने वाले लोगों की जानकारी क्यों जुटा रही पुलिस?
पुलिस द्वारा जिम में आने वाले लोगों की जानकारी जुटाने का उद्देश्य कथित नेटवर्क के संभावित संपर्कों का पता लगाना हो सकता है। यदि वहां नियमित रूप से आरोपी समूह के लोग मिलते थे, तो CCTV फुटेज, रजिस्टर, मोबाइल संपर्क या अन्य उपलब्ध जानकारी जांच में उपयोगी हो सकती है।
लेकिन पुलिस को यह भी अलग करना होगा कि जिम में आने वाले सामान्य ग्राहक कौन थे और कथित नेटवर्क से जुड़े व्यक्ति कौन हो सकते हैं।
जांच के दौरान केवल संपर्क में होने को अपराध में शामिल होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका को अलग-अलग साक्ष्यों के आधार पर स्थापित करना जरूरी होगा।
फर्जी GST पंजीकरण ने पुलिस के सामने खोली नई जांच की दिशा
इस मामले में फर्जी फर्मों के साथ GST पंजीकरण का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। इसका मतलब यह है कि पुलिस की जांच केवल बैंक खातों तक सीमित नहीं रहेगी।
जांचकर्ताओं को यह भी देखना होगा कि फर्में कब पंजीकृत हुईं, किसके नाम पर हुईं, उनका पता क्या था, GST पंजीकरण के लिए कौन से दस्तावेज दिए गए और इन फर्मों के नाम पर वास्तव में कोई वैध कारोबारी गतिविधि हुई भी थी या नहीं।
यदि फर्म केवल बैंकिंग लेनदेन के लिए बनाई गई थीं, तो यह पूरे कथित नेटवर्क की कार्यप्रणाली समझने में महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकती है।
बैंक खातों की जांच से खुल सकता है रकम का पूरा रास्ता
साइबर ठगी के मामलों में केवल आरोपी की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होती। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होता है कि पीड़ित से पैसा निकलने के बाद वह कहां-कहां गया।
इस मामले में पुलिस को गिरफ्तार आरोपियों से जुड़े बैंक खातों की transaction history खंगालनी होगी। इससे रकम के आने और जाने की श्रृंखला सामने आ सकती है।
यदि एक खाते से दूसरे खाते में पैसा लगातार ट्रांसफर हुआ है, तो उन खातों के धारकों और उनके बीच संबंधों की जांच की जा सकती है। इसके बाद एटीएम से निकासी की जानकारी को बैंकिंग रिकॉर्ड और CCTV फुटेज से मिलाया जा सकता है।
इस तरह जांचकर्ता कथित money trail को जोड़ने का प्रयास कर सकते हैं।
बरामद चेकों से भी मिल सकती है अहम जानकारी
पुलिस के अनुसार अलग-अलग बैंकों के बड़ी संख्या में चेक बरामद हुए हैं। इनमें कई चेक पर हस्ताक्षर और मुहर लगी हुई थी।
चेक पर दर्ज जानकारी से खाताधारक, फर्म, बैंक शाखा और संभावित लेनदेन से जुड़े सुराग मिल सकते हैं। पुलिस इन दस्तावेजों की जांच करके यह समझने की कोशिश कर सकती है कि उनका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया था।
यदि किसी चेक का इस्तेमाल संदिग्ध लेनदेन में हुआ है तो उसकी बैंकिंग एंट्री भी जांच के दायरे में आ सकती है।
साइबर ठगी में ‘मनी म्यूल’ की भूमिका की भी जांच जरूरी
ऐसे मामलों में अक्सर कुछ बैंक खाते ऐसे व्यक्तियों के नाम पर इस्तेमाल किए जाते हैं जो खुद कथित साइबर ठगी नहीं करते, लेकिन उनके खाते में पैसा पहुंचता है और फिर वहां से आगे भेजा या निकाला जाता है।
ऐसे खातों को जांच एजेंसियां आम तौर पर money trail के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखती हैं।
रायबरेली मामले में भी पुलिस को यह जांच करनी होगी कि फर्जी फर्मों और बैंक खातों के नाम पर जिन लोगों की पहचान इस्तेमाल हुई, वे स्वयं इस कथित नेटवर्क में शामिल थे या उनके दस्तावेजों का किसी अन्य तरीके से दुरुपयोग किया गया।
कई राज्यों तक जांच पहुंचने की संभावना
गिरफ्तार आरोपियों में इंदौर के चार लोगों के शामिल होने से जांच का दायरा मध्य प्रदेश तक जा सकता है। वहीं बांदा के आरोपी के कारण उत्तर प्रदेश के दूसरे हिस्से से भी कथित नेटवर्क के संबंधों की जांच हो सकती है।
पुलिस अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि क्या गिरफ्तार आरोपियों के अलावा अन्य लोग भी इस नेटवर्क में शामिल हैं।
सीओ सिटी आशीष निगम ने भी बताया कि गिरोह के अन्य सदस्यों और रैकेट के विस्तार की जानकारी जुटाई जा रही है।
इसका अर्थ है कि पुलिस फिलहाल मामले को केवल आठ गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं मान रही है और कथित नेटवर्क के अन्य हिस्सों की भी जांच कर रही है।
साइबर ठगी की रकम को घुमाने का मकसद क्या था?
पुलिस के अनुसार कथित गिरोह का मुख्य उद्देश्य साइबर ठगी से हासिल रकम को ऐसे बैंक खातों में प्राप्त करना था जिन्हें फर्जी फर्मों के नाम पर संचालित किया जाता था।
इसके बाद रकम कई खातों में ट्रांसफर की जाती और अंत में ATM के माध्यम से नकदी निकाली जाती थी।
ऐसी व्यवस्था में अपराध की जांच के दौरान कई सवाल उठते हैं—किसने पीड़ित से ठगी की, किसने बैंक खाता उपलब्ध कराया, किसने पैसा ट्रांसफर किया और किसने ATM से नकदी निकाली।
हर स्तर पर अलग-अलग व्यक्ति की भूमिका हो सकती है। पुलिस अब इन कड़ियों को जोड़ने का प्रयास कर रही है।
मोबाइल फोन भी जांच का अहम हिस्सा
पुलिस ने आरोपियों के पास से मोबाइल फोन भी बरामद किए हैं। साइबर अपराध से जुड़े मामलों में मोबाइल डिवाइस जांच के लिए महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य हो सकते हैं।
फोन में मौजूद कॉल रिकॉर्ड, संपर्क, संदेश, बैंकिंग से संबंधित संचार या अन्य डिजिटल जानकारी से कथित नेटवर्क के बारे में सुराग मिल सकते हैं।
हालांकि किसी मोबाइल में किसी व्यक्ति का नंबर या बातचीत मिलना अपने आप अपराध सिद्ध नहीं करता। डिजिटल साक्ष्यों को अन्य सबूतों के साथ जोड़कर देखा जाना आवश्यक होता है।
पुलिस अब पुराने साइबर ठगी मामलों से भी जोड़ सकती है कड़ियां
यदि बरामद बैंक खातों में पहले से दर्ज साइबर अपराधों की रकम मिली है, तो पुलिस उन मामलों के साथ भी इस गिरोह की संभावित कड़ी तलाश सकती है।
इसके लिए बैंकिंग transaction history, शिकायतों में दर्ज रकम, फर्जी फर्मों के पंजीकरण और आरोपियों की गतिविधियों की तुलना की जा सकती है।
यदि कई अलग-अलग मामलों में पैसा एक ही खाते या उससे जुड़े खातों तक पहुंचा है, तो जांच का दायरा और बढ़ सकता है।
पीड़ितों तक पैसा लौटाना भी जांच की बड़ी चुनौती
साइबर अपराध की जांच में आरोपियों की गिरफ्तारी के साथ पीड़ितों की रकम की पहचान और recovery भी महत्वपूर्ण होती है।
यदि पुलिस यह पता लगा पाती है कि ठगी की रकम किन खातों में गई और उसमें से कितनी रकम अभी उपलब्ध है, तो कानून के तहत आगे की प्रक्रिया में पीड़ितों को राहत दिलाने की संभावना बन सकती है।
इसलिए इस मामले में केवल गिरफ्तारी ही नहीं, बल्कि रकम के पूरे रास्ते की जांच भी बेहद महत्वपूर्ण होगी।
रायबरेली पुलिस की कार्रवाई के बाद कई सवालों के जवाब बाकी
आठ गिरफ्तारियों और बड़ी संख्या में बैंकिंग दस्तावेज बरामद होने के बाद पुलिस के सामने अब कई सवाल हैं।
कितनी फर्जी फर्में बनाई गईं? कितने बैंक खाते खुलवाए गए? इन खातों में कितनी साइबर ठगी की रकम आई? किन-किन राज्यों के पीड़ितों का पैसा इन खातों तक पहुंचा? गिरोह का मुख्य संचालक कौन था? आरोपियों को फर्जी दस्तावेज और बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराने वाला कौन था?
इन सवालों के जवाब आगे की जांच से सामने आने की उम्मीद है।
साइबर अपराध का बदलता तरीका बना पुलिस के लिए चुनौती
ऑनलाइन ठगी के मामले लगातार नए तरीकों के साथ सामने आते हैं। कभी फर्जी कॉल के जरिए लोगों को निशाना बनाया जाता है, तो कभी निवेश, नौकरी, डिजिटल गिरफ्तारी, बैंकिंग या अन्य बहानों से पैसे ठगे जाते हैं।
लेकिन ठगी के बाद पैसा कहां जाए, यह अपराधियों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण होता है। इसी वजह से बैंक खाते, फर्जी कंपनियां और पहचान दस्तावेज साइबर अपराध की जांच में अहम भूमिका निभाते हैं।
रायबरेली का यह मामला इसी कथित नेटवर्किंग मॉडल की ओर इशारा करता है, जहां ठगी करने वाले और रकम को आगे पहुंचाने वाले लोग अलग-अलग हो सकते हैं।
आम लोगों के लिए भी जरूरी है सतर्क रहना
साइबर अपराध से बचने के लिए आम लोगों को अनजान कॉल, संदेश और लिंक के प्रति सतर्क रहना चाहिए। बैंकिंग PIN, OTP, पासवर्ड या संवेदनशील वित्तीय जानकारी किसी अनजान व्यक्ति के साथ साझा नहीं करनी चाहिए।
किसी भी व्यक्ति को अपने नाम पर अनजान फर्म, GST पंजीकरण या बैंक खाता खुलवाने की अनुमति देना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति दस्तावेज लेकर व्यवसाय, बैंक खाता या अन्य वित्तीय काम के नाम पर उनका इस्तेमाल करना चाहता है, तो उसकी पूरी जानकारी और वैधता की पुष्टि करना जरूरी है।
किसी दस्तावेज का गलत इस्तेमाल होने पर संबंधित व्यक्ति को कानूनी और वित्तीय परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
फर्जी फर्म के नाम पर बैंक खाता खुलवाना क्यों गंभीर मामला है
बैंक खाता किसी भी वैध कारोबारी गतिविधि का महत्वपूर्ण वित्तीय माध्यम होता है। यदि किसी फर्म के नाम पर खाता खोला गया है लेकिन वास्तविक कारोबार नहीं है और खाते का इस्तेमाल संदिग्ध रकम के लेनदेन के लिए किया जा रहा है, तो यह जांच एजेंसियों के लिए गंभीर संकेत हो सकता है।
रायबरेली पुलिस द्वारा बरामद किए गए दस्तावेजों की संख्या इस मामले को और महत्वपूर्ण बनाती है। हालांकि इन दस्तावेजों का वास्तविक इस्तेमाल और प्रत्येक आरोपी की भूमिका जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
आठ गिरफ्तारियां, लेकिन नेटवर्क की तस्वीर अभी अधूरी
पुलिस ने आठ आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन स्वयं पुलिस के अनुसार गिरोह के अन्य सदस्यों और रैकेट के विस्तार की जानकारी जुटाई जा रही है।
इससे साफ है कि जांच अभी समाप्त नहीं हुई है।
गिरफ्तारियों के बाद पुलिस के सामने अब कथित नेटवर्क के ऊपरी स्तर तक पहुंचने की चुनौती होगी। फर्जी फर्म किसने बनवाईं, बैंक खाते किसने खुलवाए, दस्तावेज कहां से आए और साइबर ठगी की रकम भेजने वाले मूल आरोपी कौन थे—इन सवालों के जवाब पूरे रैकेट की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकते हैं।
इंदौर से रायबरेली तक जुड़ी कड़ियों पर पुलिस की नजर
चार आरोपियों का इंदौर से होना यह संकेत देता है कि पुलिस की जांच रायबरेली से बाहर भी जा सकती है। यदि बैंक खातों, मोबाइल संपर्क और दस्तावेजों की जांच में अन्य शहरों के लोगों के नाम सामने आते हैं, तो पुलिस उनसे भी पूछताछ कर सकती है।
बांदा के आरोपी की गिरफ्तारी भी नेटवर्क की भौगोलिक पहुंच को समझने में मदद कर सकती है।
हालांकि फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि पूरा गिरोह कितने शहरों या राज्यों में फैला है। पुलिस की आगे की जांच ही इसका स्पष्ट जवाब देगी।
रायबरेली में साइबर अपराध के खिलाफ कार्रवाई से बढ़ी उम्मीद
पुलिस की इस कार्रवाई से साइबर अपराध के खिलाफ स्थानीय स्तर पर जांच और कार्रवाई को लेकर उम्मीद बढ़ी है। खास तौर पर ऐसे मामलों में जहां साइबर ठगी का पैसा अलग-अलग बैंक खातों में पहुंचता है, वहां पुलिस और बैंकिंग संस्थाओं के बीच तेज समन्वय महत्वपूर्ण होता है।
रकम की पहचान, खाते को सुरक्षित करना, संदिग्ध लेनदेन का पता लगाना और आरोपियों तक पहुंचना—ये सभी कदम समय से उठाए जाएं तो जांच को मजबूत किया जा सकता है।
रायबरेली में अब पुलिस की अगली कार्रवाई यह तय करेगी कि गिरफ्तार आठ आरोपियों के अलावा कथित नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल थे।
पुलिस की जांच में अब खुलेगा साइबर ठगी के पैसों का पूरा राज
रायबरेली में सामने आया यह मामला दिखाता है कि साइबर अपराध केवल मोबाइल फोन या इंटरनेट पर होने वाली ठगी तक सीमित नहीं रहता। उसके पीछे बैंक खातों, दस्तावेजों, फर्जी कारोबारी पहचान और नकदी निकासी का पूरा नेटवर्क भी हो सकता है।
पुलिस के अनुसार गिरफ्तार गिरोह फर्जी फर्म और GST पंजीकरण के माध्यम से बैंक खाते तैयार कराता था, उनमें साइबर ठगी की रकम मंगाता था और फिर उसे कई खातों में घुमाने के बाद ATM से नकदी निकालकर बांटता था।
अब बरामद 16 सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के चेक, 56 उत्कर्ष स्मॉल फाइनेंस बैंक के चेक, 34 हस्ताक्षर और मुहर लगे बैंक चेक, इंडियन बैंक का भरा हुआ खाता खोलने का फॉर्म, एटीएम कार्ड, मोबाइल फोन और अन्य दस्तावेज जांच की अहम कड़ियां बन सकते हैं।
सीओ सिटी आशीष निगम के अनुसार गिरोह के अन्य सदस्यों और इसके विस्तार की जानकारी जुटाई जा रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस कथित नेटवर्क से जुड़े और नाम सामने आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

