Allahabad High Court का बड़ा फरमान: प्रतापगढ़ के अनुदानित स्कूल में परिजनों की नियुक्ति पर कोर्ट सख्त, निदेशक से तलब रिपोर्ट
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। Allahabad High Court की लखनऊ बेंच ने प्रतापगढ़ जिले के एक अनुदानित विद्यालय में परिजनों की नियुक्ति को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। कोर्ट ने न केवल जवाबी हलफनामे में अधूरी जानकारी पर नाराजगी जताई, बल्कि माध्यमिक शिक्षा निदेशक को स्वयं वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अगली सुनवाई में उपस्थित होने का आदेश दिया।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और राजीव भारती की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि “जब निचले स्तर के अधिकारी जवाब देते हैं, तब ऐसे अधूरे और गैरजिम्मेदार हलफनामे सामने आते हैं।” कोर्ट की यह टिप्पणी शिक्षा विभाग में जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी पर सीधा प्रहार मानी जा रही है।
प्रबंध समिति में परिजनों की नियुक्ति पर बवाल
याचिका में यह आरोप लगाया गया कि विद्यालय की प्रबंध समिति ने नियमों की खुली धज्जियां उड़ाते हुए अपने परिजनों को स्कूल में विभिन्न पदों पर नियुक्त किया है। रिपोर्ट के अनुसार, विद्यालय प्रशासन ने न केवल प्रधानाचार्य और सहायक अध्यापकों को हटाया, बल्कि अपने करीबी रिश्तेदारों को उनकी जगह बैठा दिया।
जांच में यह भी सामने आया कि न तो किसी प्रकार की पूर्व अनुमति ली गई, न ही रिक्त पदों का अखबारों में कोई विज्ञापन जारी किया गया। यह नियुक्तियां पूरी तरह से नियमविरुद्ध पाई गईं। डीआईओएस, प्रतापगढ़ द्वारा कराई गई जांच में इन सभी तथ्यों की पुष्टि की गई, जिसकी रिपोर्ट 4 जून 2011 को प्रस्तुत की गई थी।
कोर्ट ने जताई नाराजगी, कहा – ‘कहां गायब है कार्रवाई की रिपोर्ट?’
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी गहरी नाराजगी जताई कि डीआईओएस की जांच रिपोर्ट उप निदेशक को भेजे जाने के बाद क्या कार्रवाई हुई, इसका कोई उल्लेख हलफनामे में नहीं था। जजों ने टिप्पणी की — “राज्य सरकार की तरफ से जवाब देने के बजाय, जब छोटे स्तर के अधिकारी बिना तैयारी के हलफनामे दाखिल करते हैं, तो न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता कमजोर पड़ती है।”
कोर्ट ने साफ निर्देश दिए कि अगली सुनवाई 26 नवंबर को होगी, और तब तक माध्यमिक शिक्षा निदेशक को व्यक्तिगत शपथ पत्र दाखिल कर पूरी जानकारी प्रस्तुत करनी होगी।
शिक्षा विभाग की साख पर सवाल — कब तक चलेगा रिश्तेदारी का खेल?
यह पहला मौका नहीं है जब अनुदानित विद्यालयों में मनमानी और पारिवारिक नियुक्तियों के आरोप सामने आए हों। यूपी के कई जिलों में ऐसी घटनाओं ने शिक्षा की साख पर दाग लगाए हैं। सूत्रों के मुताबिक, कई प्रबंध समितियां “रिश्तेदारों की फैक्ट्री” की तरह चल रही हैं, जहां मेरिट नहीं, बल्कि “मामाजी–चाचाजी–भतीजे” की पहचान नौकरी तय करती है।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जब सरकारी अनुदान से चल रहे विद्यालयों में योग्यता की जगह संबंध का बोलबाला होगा, तो शिक्षण की गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ेगा।
कानूनी विशेषज्ञों ने क्या कहा – अदालत की सख्ती से बनेगा मिसाल
वरिष्ठ अधिवक्ता अमित श्रीवास्तव का कहना है, “हाईकोर्ट की यह सख्ती स्वागत योग्य है। अगर न्यायपालिका ऐसी नियुक्तियों पर लगातार नजर रखेगी, तो आने वाले समय में शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।”
उन्होंने कहा कि निदेशक स्तर के अधिकारी को तलब करना यह संदेश देता है कि अब विभागीय लापरवाही को ‘सिर्फ कागजी खानापूर्ति’ मानकर नहीं छोड़ा जाएगा।
शिक्षकों में भी नाराजगी, बोले – अब तो व्यवस्था बदले
प्रतापगढ़ सहित आसपास के जिलों के शिक्षकों में भी इस आदेश को लेकर चर्चा तेज है। एक शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “जब तक ऊपर से सख्त निगरानी नहीं होगी, तब तक निचले स्तर पर कोई सुधार संभव नहीं है। कई जगह नियुक्तियां पैसे या संबंधों के दम पर होती हैं।”
शिक्षा जगत में यह उम्मीद जताई जा रही है कि हाईकोर्ट की यह सख्त कार्रवाई भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ बड़ा कदम साबित हो सकती है।
प्रदेश भर के अनुदानित विद्यालयों की पड़ताल की मांग
कई शिक्षा संगठनों ने अब पूरे प्रदेश में अनुदानित विद्यालयों की स्वतंत्र जांच की मांग की है। संगठनों का कहना है कि सिर्फ प्रतापगढ़ नहीं, बल्कि प्रयागराज, फैजाबाद, और गोंडा जैसे जिलों में भी “घरेलू नियुक्तियों” की शिकायतें बार-बार उठती रही हैं।
यह भी सुझाव दिया गया कि शिक्षा विभाग को अब एक “स्वतंत्र मॉनिटरिंग सेल” बनानी चाहिए, जो अनुदानित संस्थानों की नियुक्तियों और फंड उपयोग पर नियमित निगरानी रखे।
जनता की निगाहें अब कोर्ट के अगले आदेश पर
26 नवंबर की सुनवाई को लेकर सबकी निगाहें अब हाईकोर्ट पर टिकी हैं। यह मामला न केवल एक विद्यालय की नियुक्तियों तक सीमित है, बल्कि यह शिक्षा विभाग की सिस्टमेटिक विफलता को भी उजागर करता है।
अगर कोर्ट सख्त कदम उठाता है, तो यह भविष्य में ऐसे सभी विद्यालयों के लिए एक मिसाल बन सकता है, जो सरकारी अनुदान का लाभ उठाते हुए नियमों की अनदेखी करते हैं।
आने वाली सुनवाई में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या माध्यमिक शिक्षा निदेशक अदालत के सभी सवालों के जवाब दे पाएंगे या फिर यह मामला और गहराई में जाएगा। शिक्षा में पारदर्शिता और ईमानदारी की बहाली के लिए यह केस अब एक बड़ी कसौटी बन गया है।

