लिव-इन रिलेशनशिप पर Allahabad High Court की बड़ी टिप्पणी: कम उम्र होने पर सुरक्षा नहीं, कोर्ट बोला- बाल विवाह को नहीं दे सकते बढ़ावा
News-Desk
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Allahabad High Court, Article 21, Court News, Hindu Marriage Act, Legal News India, Live-in Couple, इलाहाबाद हाईकोर्ट, प्रयागराज न्यूज, बाल विवाह कानून, लिव इन रिलेशनशिप, हाईकोर्ट फैसलाAllahabad High Court ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए साफ कहा है कि यदि साथ रहने वाले युवक या युवती में से किसी एक की उम्र विवाह की तय कानूनी सीमा से कम है, तो अदालत ऐसे कपल को अनुच्छेद 226 के तहत सुरक्षा नहीं दे सकती। कोर्ट ने कहा कि न्यायालय ऐसा कोई आदेश पारित नहीं कर सकता जिससे कम उम्र में शादी जैसी चीजों को बढ़ावा मिले।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति Garima Prasad ने एक लिव-इन कपल की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। कोर्ट ने मामले में दाखिल याचिका को खारिज कर दिया, हालांकि अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि दोनों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है।
मुस्लिम युवती 20 साल की, युवक की उम्र 19 वर्ष
मामले में याचिका दाखिल करने वाले कपल में युवती मुस्लिम समुदाय से संबंधित है और उसकी उम्र 20 वर्ष बताई गई। वहीं युवक अनुसूचित जाति समुदाय से है और उसकी उम्र 19 वर्ष है। दोनों काफी समय से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे थे।
याचिका में आरोप लगाया गया था कि युवती के पिता दोनों को धमकी दे रहे हैं और उनकी जान को खतरा है। इसी आधार पर कपल ने हाईकोर्ट से सुरक्षा की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि युवक की उम्र 21 वर्ष से कम है, जबकि भारतीय कानून के अनुसार पुरुष की शादी की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष निर्धारित है।
कोर्ट ने कहा- कानून बाल विवाह रोकता है, अदालत विरोधाभासी आदेश नहीं दे सकती
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब देश का कानून बाल विवाह और कम उम्र में शादी पर रोक लगाता है, तब अदालत ऐसा कोई आदेश नहीं दे सकती जो अप्रत्यक्ष रूप से उस व्यवस्था को बढ़ावा दे।
कोर्ट ने कहा कि यदि कम उम्र में साथ रहने वाले कपल को विशेष सुरक्षा दी जाती है, तो इससे गलत संदेश जा सकता है और यह कानून की मूल भावना के खिलाफ माना जाएगा।
न्यायालय ने अपने फैसले में Hindu Marriage Act का हवाला देते हुए कहा कि भारत में विवाह के लिए पुरुष की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिला की 18 वर्ष निर्धारित है। अदालत ने यह भी कहा कि माता-पिता, अभिभावक या बाल विवाह रोकने वाले अधिकारी कानून के तहत कार्रवाई कर सकते हैं और उन्हें ऐसा करने से रोका नहीं जा सकता।
धमकी के आरोपों पर कोर्ट ने जताई शंका
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि याचिका में लगाए गए धमकी संबंधी आरोपों के समर्थन में पर्याप्त और ठोस सबूत पेश नहीं किए गए। अदालत के अनुसार केवल सामान्य आरोपों के आधार पर सुरक्षा आदेश जारी नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि किसी भी सुरक्षा याचिका में यह आवश्यक है कि खतरे या धमकी से जुड़े पर्याप्त तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत किए जाएं ताकि अदालत उचित निर्णय ले सके।
अनुच्छेद 21 के अधिकार का भी किया उल्लेख
हालांकि याचिका खारिज करते हुए अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी व्यक्ति को वास्तविक खतरा होता है, तो कानून उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।
कोर्ट ने संकेत दिया कि संविधान प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है, लेकिन उस अधिकार का प्रयोग कानून की सीमाओं के भीतर होना चाहिए।
लिव-इन रिलेशनशिप और कानून पर बढ़ रही बहस
पिछले कुछ वर्षों में देशभर में लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों में तेजी से वृद्धि देखी गई है। कई बार ऐसे कपल परिवार या समाज के विरोध के कारण अदालतों का दरवाजा खटखटाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय न्यायालयों ने कई मामलों में वयस्कों को अपनी पसंद से साथ रहने का अधिकार दिया है, लेकिन जहां किसी एक पक्ष की उम्र कानूनी विवाह आयु से कम होती है, वहां अदालतें अधिक सतर्क रुख अपनाती हैं।
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक अदालतें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक कानूनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं। यही कारण है कि प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग फैसले सामने आते हैं।
समाज और परिवार के दबाव के बीच बढ़ रहे ऐसे मामले
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरजातीय और अंतरधार्मिक संबंधों के मामलों में परिवारों का विरोध अक्सर कानूनी विवाद का रूप ले लेता है। कई कपल सुरक्षा के लिए अदालतों में याचिका दाखिल करते हैं।
हालांकि अदालतें यह भी देखती हैं कि संबंध पूरी तरह कानूनी मानकों के अनुरूप हैं या नहीं। कम उम्र के मामलों में अदालतें विशेष रूप से सावधानी बरतती हैं ताकि किसी भी प्रकार से बाल विवाह या अवैध संबंधों को बढ़ावा न मिले।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद कानूनी हलकों में चर्चा तेज
Allahabad High Court के इस फैसले के बाद कानूनी और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कई लोग इसे कानून के पालन की दिशा में अहम फैसला बता रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दृष्टिकोण से भी देख रहे हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला स्पष्ट करता है कि अदालतें व्यक्तिगत अधिकारों का सम्मान जरूर करती हैं, लेकिन कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम आयु सीमा की अनदेखी नहीं कर सकतीं।

