पटाखों पर बैन: सिर्फ़ Diwali पर चलने वाले पटाखे ही Pollution का एक मात्र कारण?

पिछले कुछ सालों से Diwali के आस-पास तमाम बुद्धिजीवी अचानक कुंभकर्णी नींद से जाग उठते है । पूरे साल अनेक मौक़ों पर चलाए जाने वाले पटाखों से उनको प्रदूषण नहीं दिखता ।

काला धुआँ छोड़ते वाहन उनके नाक के नीचे से भी चले जाए तो उनको कुछ ग़लत नहीं दिखता, यहाँ तक कि अनेक कारख़ानो से सालों साल निरंतर निकलता धुआँ उनकी आँख नाक में दिक़्क़त नहीं करता। उनको तो सिर्फ़ दीपावली पर चलने वाले पटाखे ही प्रदूषण का एक मात्र कारण दिखते है ।

अगर माना कि वास्तव में ऐसा है तो भी कुछ दिन पटाखे बैन करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है क्योंकि बीते सालो में देखा यही गया है कि पटाखे चलाने या बेचने पर बैन लगाने पर भी पटाखों के चलाने पर कुछ ख़ास अंतर नहीं पड़ा, हाँ ये ज़रूर हुआ कि पटाखे चोरी छिपे ब्लैक में बिकने लगे ।

मेरा यह मानना है कि यदि पटाखों से प्रदूषण होता है तो पटाखे चलाने या बेचने पर बैन लगाने से अच्छा तो पटाखे बनाने पर बैन होना चाहिए । इस बात पर तमाम बुद्धिजीवी मानवता की दुहाई देते हुए उन कारख़ानो में काम करने वाले लाखों लोगों के रोज़गार का हवाला देने लगेंगे ।

अब यदि पूरे साल के अपेक्षा दीपावली पर ही अधिक पटाखे चलाए जाते है तो फिर ये भी है कि पटाखा इंडस्ट्री की कमाई दीपावली पर ही अधिक निर्भर होती है ।

अब अगर पटाखे चलाए ही नहीं जाएँगे तो ख़रीदेगा कौन ? और जब बिकेंगे नहीं तो कमाई कैसी ?

इस समस्या का स्थायी समाधान, उन कारीगरों को जान के जोखिमपूर्ण कार्य से मुक्त कर किसी अन्य कार्य में लगाना ही हो सकता है, जिससे ना सिर्फ़ प्रदूषण रोका जा सकता बल्कि पटाखे बनाते समय होने वाली दुर्घटना रोक होने वाली मानवीय क्षति को भी कम किया जा सकता है ।

 

Shashank Goel

शशांक गोयल पेशे से मैकेनिकल इंजीनियरिंग के सहायक प्रवक्ता हैं। सम-सामयिक विषयो पर लिखने वाले शशांक की काव्य कृतियाँ और लेखन प्रबुद्ध वर्ग द्वारा सराहा जाता हैं। प्रकाशन और अध्यापन से जुड़े शशांक गोयल लाइफ कोच के रूप में समाज के हर तबके से जुड़े रहने का प्रयास करते हैं।

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