Meera के प्रभु गिरधर नागर: मीरा को द्वारिकाधीश का संदेश

इक साँवला नव किशोर यति जिसने स्वयं को श्री द्वारिकाधीश का निज सेवक बताया , उसके आने से मीरा थोड़ा प्रसन्नचित्त दिखाई देने लगी। वह जोगी , मीरा के प्रति ठाकुर जी का विरह वर्णन करता जाता था और मीरा भी प्रभु की अन्तरंग वार्ता श्रवण कर हर्ष-विह्वल हो रही थी।

 जोगी Meera को द्वारिकाधीश का संदेश देते कहने लगा ,” क्या कहूँ देवी ! आपको देखकर ही स्वामी की आकुलता समझ में आती हैं ।आप  तो उनके ह्रदय में विराजती हैं। आप चिंता त्याग दें !! प्रभु आपको अपनाने शीघ्र ही पधारेंगे..और फिर उनसे कभी वियोग नहीं होगा ।मुझे उन्होंने आपके लिए यही संदेश देकर भेजा हैं।” योगिराज ने मीरा को सांत्वना देते हुये कहा  ।
 
             मीरा प्रभु का स्नेह से परिपूर्ण  सन्देश सुन हर्ष से विहवल हो उठी । कितने ही दिनों के पश्चात वह प्रसन्नता से पाँव में नुपुर बाँधकर, करताल ले नृत्य करने लगी। मीरा के प्रसन्न ह्रदय की फुहार ने उसके रचित पद की शब्दावली को भी आनन्द से भिगो दिया  ……..

सुरण्या री म्हें तो ‘ हरि आवेंगे आज ।
मेहलाँ चढ़चढ़ जोवाँ सजनी कब आवें महाराज।।

दादुर मोर पपीहा बोले कोयल मधुराँ साज ।
उमड्यो इन्द्र चहूँ दिश बरसे दामन छोड्या लाज।।

धरती रूप नव-नव धार्या इंद्र मिलण रे काज।
मीरा रे प्रभु गिरधर नागर बेग मिलो महाराज ।।

 यति और दासियाँ मीरा को यूँ प्रसन्न देख आनन्दित हुये ।  जब-जब यति जाने की इच्छा प्रकट करता तो मीरा चरण पकड़कर रोक लेती -” कुछ दिन और मेरे प्यासे कर्णो में प्रभु की वार्ता रस सुधा-सिंचन की कृपा करें !! “

                  ……….और मीरा के अश्रु भीगे आग्रह से बंधकर योगी भी ठहर जाते ।मीरा ने एक बार भी उनसे उनका नाम, गावं या काम नहीं पूछा, केवल बारम्बार प्रभु के रूप-गुणों की चर्चा सुनाने का अनुरोध करती ,जिसकी एक-एक सुधा-बूँद शुष्क भूमि-सा प्यासा उसका ह्रदय सोख जाता । वह बार-बार पूछती ,” कभी प्रभु अपने मुखारविंद से मेरा नाम लेते हैं ?? कभी उनके रसपूर्ण प्रवाल अधरों पर मुझ विरहिणी का नाम भी आता हैं:??  वे मुझे किस नाम से याद करते हैं  योगिराज ?? सबकी तरह मीरा ही कहते हैं कि ……..!”
   
           ” देवी ! वे आपको मीरा कहकर ही स्मरण करते हैं। जैसे आप उनकी चर्चा करते नहीं अघाती ( थकती ) ,वैसे ही कभी-कभी तो हमें लगता हैं कि प्रभु को आपकी चर्चा करने का व्यसन हो गया हैं । वे जैसे ही अपने अन्तरंग जनों के बीच एकांत में होते हैं , आपकी बात आरम्भ कर देते हैं। देवी वैदर्भी ने तो कई बार आग्रह किया आपको बुला लेने के लिए अथवा प्रभु को स्वयं पधारने के लिये ।”

सच कहते हैं भगवन ? प्रभु के पाटलवर्ण उन सुकोमल अधरों पर दासी का नाम आया  ?’ कहकर, जैसे वे स्वयं प्रभु हो , धीरे से अपने नाम का उच्चारण करती – ‘ म़ी……. रा ।’ मीरा फिर कहती –‘ भाग्यवान अक्षरों ! तुम धन्य हो !! तुमने मेरे प्राणधन के होठों का स्पर्श पाया हैं !! स्पर्श पाया हैं उनकी मुख वायु का !! कहो तो ,किस तपस्या से ,किस पुण्य बल से तुमने यह अचिन्त्य सौभाग्य पाया ? ओ भाग्यवान वर्णों ! वह राजहंस सम धवल ( श्वेत ) पांचजन्य ही जानता हैं उन अधरों का रस …… इसलिए तो  मुखर पांचजन्य उस सुधा -मधुरिमा का जयघोष करता रहता हैं यदा-कदा । “……..वह हंसकर कहती और नेत्र बंद कर मुग्धा-सी धीरे-धीरे अपना ही नाम उच्चारण करने लगती । मीरा की वह भावमग्न दशा देखकर योगी उसकी चरण-रज पर मस्तक रख देते ,उनकी ( यति ) आँखों से निकले आँसुओं से वह स्थान भीग जाता ।

 वह दिन आ गया जब योगी ने जाने का निश्चय कर अपना झोली- डंडा उठाया ।मीरा उन्हें रोकते हुए व्याकुल हो उठी–” आपके पधारने से मुझे बहुत शान्ति मिली योगीराज ! अब आप भी जाने को कहते हैं ,तब प्राणों को कैसे शीतलता दे पाऊँगी । आप ना जाये प्रभु !! न जाये !! “

          एक क्षण में ही मानो जैसे आकाश में विद्युत दमकी हो ……ऐसे ही योगी के स्थान पर द्वारिकाधीश हँसते खड़े दिखलाई दिये….. और दूसरे ही क्षण अलोप!!!!! मीरा व्याकुल हो उठी ……..

जोगी मत जा…..मत जा….
     मत जा …….जोगी ……
     पाँय परु मैं तेरे………
      मत जा……… जोगी….

 प्रेम भक्ति को पेंडों ही न्यारो,
      हमकूँ गैल बता जा ……
   
अगर चन्दन की चिता बणाऊँ,
     अपने हाथ जला जा……..

जल बल होय भस्म की ढेरी,
     अपणे अंग लगा जा ……

मीरा के प्रभु गिरधर नागर,
     जोत में जोत मिला जा ……
       मत जा……मत जा……
       मत जा…… जोगी…….

मीरा रात दिन व्याकुल होकर सोचती -” कितने ही दिन प्रभु के साथ रही, पर मैं अभागिन उन्हें पहचान नहीं पाई। उन्हें योगी समझकर दूर दूर ही रही। अच्छे से उनके चरणों में शीश भी नहीं निवाया। हे ठाकुर ! करूणा भी करने आये थे तो वह भी छल से…..! अगर स्वयं को प्रकट कर देते तो प्रभु आपकी करूणा में कुछ कमी हो जाती -” वह रोते रोते निहोरा देने लगी ।

फिर मीरा के भाव ने करवट बदली और स्वयं की प्रीति में ही कमी पा कर बोली ,” हा ! कहतें है कि सच्चा प्रेम तो अंधेरी रात में सौ पर्दों के पीछे भी अपने प्रेमास्पद को पहचान लेता है ।पर मुझ अभागिन में प्रेम होता तो उन्हें पहचानती न ? मुझमें प्रेम पाते तो वह योगी होने का नाटक क्यों करते ?अब मैं क्या करूँ , उन्हें कैसे पाऊँ ? क्या योगी भी एक स्थान पर अधिक देर तक कभी रूककर किसी के अपने हो पायें है ? “

जोगिया से प्रीत कियाँ दुख होई ।
प्रीत कियाँ सुख न मोरी सजनी जोगी मीत न होई।
रातदिवस कल नहिं परत है तुम मिलियाँ बिन मोई॥
ऐसी सूरत याँ जग माँही फेरि न देखि सोई।
मीरा रे प्रभु कब रे मिलोगे मिलियाँ आनन्द होई ॥

पूर्णिमा की उज्ज्वल रात्रि है। समुद्र के ज्वार को उमड़ते हुये देख मीरा उससे बातें करने लगी -” हे सागर ! तेरी दशा भी मुझ जैसी ही है।तू कितना भी उमड़े ,उत्ताल लहरें ले ,किन्तु चन्द्र तक की दूरी तय करना तेरे बस की बात नहीं – इसी तरह ,मेरे भी प्राणनाथ मुझसे दूर जा बसे हैं। मैं गुणहीन उन्हें कैसे रिझाऊँ ? पता नहीं , वह धाम कहाँ  है जहाँ मेरे प्रभु विराजते है ?”

          मीरा गम्भीर रात्रि में एकटक सागर की तरफ़ देखती रहती-” हे महाभाग्यवान रत्नाकर ! तुम स्वामी को कितने प्रिय हो ? ससुराल होने पर भी वह स्थाई रूप से  तुम्हारे यहाँ ही रहना पसन्द करते हैं । इतना ही मानों पर्याप्त न हो , द्वारिका भी तुम्हारे ही बीच बसाई ।अपने प्रभु के प्रति तुम्हारा प्रेम असीमित है। सदा उनसे मिले होने पर भी तुम उनके मधुर नामों का गुणगान करते रहते हो। अहा ! मधुर नाम कीर्तन करते करते , उनके श्यामल स्वरूप का दर्शन करते करते तुम स्वयं उसी वर्ण के हो गये हो !!! तुम धन्य हो ,जो अपने प्रभु के रंग में रच बस गये हो , और मैं अभागिनी अपने प्रियतम के दर्शन से भी वंचित हूँ ।क्या तुम मेरा संदेश मेरे स्वामी तक पहुँचा दोगे ?”

              ” उनसे कहना कि एक दिन एक सुन्दर ,सुकुमार किशोर एक दिन ज़रीदार केसरिया वस्त्रों से सुशोभित अपने श्याम कर्ण अश्व पर सवार होकर मेरे पिता के द्वार पर आया था। मण्डप में बैठकर मेरे पिता ने उसके हाथ में मेरा कन्यादान किया। जब एकान्त कक्ष में मैंने उनके दर्शन किए तो….. वह रूप…… वह छवि उसका कैसे वर्णन करूँ ? हे सागर ! तुम्हारी तो फिर भी कोई सीमा ,कोई थाह होगी पर उनके रूप माधुर्य को किसी परिधि किसी उपमा में नहीं बाँधा जा सकता। क्या तुमने उनकी वे रतनारी अखियाँ देखी है ? क्या कभी उस अणियारी चितवन के तुमने दर्शन किये है ? क्या कहा ?? उसी चितवन से ही घायल हो कर रात्रि पर्यन्त हाहाकार करते हो ? सत्य कहते हो भैया !! उनकी मुस्कान से अधिक क्रूर कोई बधिक ( शिकारी ) नहीं सुना जाना ।इनकी चितवन की छुरी भी ऐसी जो उल्टी धार की -कि जो कण्ठ पर चलती ही रहे , छटपटाते युग बीत जायें ,पर न बलि -पशु मरे और न छुरी रूके ………… कहो तो यह कैसा व्यापार है ?”

” हाँ ….तो मैं तुम्हें बता रही थी कि मैं तो अभी उस रूप माधुरी की मात्र झाँकी ही कर पाई थी कि मुझे अथाह वियोग में ढकेल , मेरे प्रियतम , मेरे हथलेवे का चिन्ह , मेरी माँग का सिन्दूर सब न जाने कहाँ अन्तर्हित हो गये। हे रत्नाकर ! तुम उनसे कहना , मैं तबसे उस चितचोर की राह देख रही हूँ ! मेरा वह किशोर ,सुन्दर शरीर आयु के प्रहार से जर्जर हो गया है ,मेरे घुटनों तक लम्बे  कृष्ण केश सफ़ेद हो गये है ,किन्तु आज भी मेरा मन उसी भोली किशोरी की भाँति अपने पति से मिलने की आशा संजोयें बैठा है ।तुम उनसे कहना ……कि यह विषम विरह तो कभी का इस देह को जला कर राख कर देता ,किन्तु दर्शन की आशा रूपी बरखा नेत्रों से झरकर उस विरह अग्नि को शीतल कर देती रही ।तुम उन द्वारिकाधीश मयूर मुकुटी से पूछना , तुमने कहीं उस निष्ठुर पुरूष को कहीं देखा है ? उसकी विरहणी की आँखें पथ जोहते जोहते धुँधलाने लगी है ….. देह जर्जर हो गई है …..आशा की डोर ने ही अब तो श्वासों को बाँध रखा है ……….पर…..अब यह वियोग और नहीं सहा जाता …..सागर से मन की बात करते वह गाने लगी………

दूखण……. लागे नैन…..
     दरस बिन …..दूखण लागे नैन…..

 

Rashmi |

 

प्रस्तुति:

रश्मि वर्मा (नोएडा)

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