माना कि वो मोहब्बत का एक आबसार था…

मेरी इबादतों, दुआओ में, भी कोई असर नहीं आया,
जुदा ऐसा हुआ वो, ताबीरो में भी नजर नहीं आया।

मोहब्बत हमें उनसे बा – दस्तूर कयामत तक रहेगी,
एक उम्र गुजरी जहां,याद उनको वो शजर नहीं आया।

माना कि वो मोहब्बत का एक आबसार था लेकिन,
कभी उस फलक से वो, इस जमीं तक नहीं आया।

बहुत ढूंढने पर भी, एक नुक्स नहीं मिला उसको,
टटोलता रहा दिल वो, आंखो की नमी तक नहीं आया।

मुख्तलिफ था वो इस रंगीन मिजाज दुनिया से,
शायद हमें ही उसको, ढंग से संजोना नहीं आया।

तोड़ दिया था उसने एक पल में ताल्लुक “दीप”
पर मुझे आज भी , उसके जैसा होना नहीं आया ।।

दीपांशु सैनी

इं0 दीपांशु सैनी (सहारनपुर, उत्तर प्रदेश) उभरते हुए कवि और लेखक हैं। जीवन के यथार्थ को परिलक्षित करती उनकी रचनाएँ अत्यन्त सराही जा रही हैं। (सम्पर्क: 7409570957)

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