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सोज़े वतन की जब्ती की सच्चाई पुस्तक का लोकापर्ण किया

मुजफ्फरनगर। एसडी कॉलेज के सभागार में आयोजित किए गए कार्यक्रम में मुंशी प्रेमचंद पर आधारित सोज़े वतन की जब्ती की सच्चाई पुस्तक का लोकापर्ण किया गया। मुजफ्फरनगर के मूर्धन्य शोध विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप जैन ने इस पुस्तक के माध्यम से कथा सम्राट प्रेमचन्द के अनछुए तथ्यों को खोजने का काम किया है।

पिछले १११ वर्षों से एक धारणा चली आ रही थी कि वर्ष १९०८ में प्रेमचन्द का धनपतराय के नाम से उर्दू में देशभक्ति पर आधारित जो कहानी संग्रह ष्सोज़े वतनष् प्रकाशित हुआ थे उसे अंग्रेजी हुकूमत ने जब्त कर लिया था। प्रेमचन्द पर सैकड़ों शोध हुए लेकिन इस जब्ती के बारे में कोई प्रमाण अभी तक सामने नहीं आया था।

डॉ. प्रदीप जैन ने प्रमाण सहित इस पुस्तक में सिद्ध किया है कि न तो उस समय तक जब्ती का कोई कानून प्रचलन में था और न ही इस प्रकार की कोई प्रतिबन्धात्म कार्यवाही हुई थी। इस पुस्तक में इस सन्दर्भ में राष्ट्रीय अभिलेखागार से प्राप्त वह सम्पूर्ण सरकारी फाइल प्रमाण के रूप में प्रस्तुत की गई है

जिसमें प्रेमचन्द के विरुद्ध राजद्रोह का अभियोग चलाने का प्रस्ताव किया गया था लेकिन कोई आपत्तिजनक सामग्री न पाए जाने पर उसे भी निरस्त कर दिया गया था। इसी पुस्तक में लखनऊ म्यूजियम से प्राप्त प्रेमचन्द की सर्विस बुक को भी प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

शहर के जानसठ रोड स्थित एसडी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के सभागार में सोजे वतन पुस्तक का लोकापर्ण समारोह आयोजित किया गया। डॉ उमाकांत शुक्ल की अध्यक्षता और विख्यात कवि मधुर नागवान के संचालन में आयोजित किए गए कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉक्टर मक्खन मुरादाबादी और विशिष्ट अतिथि डॉक्टर लोकेंद्र त्यागी ने संयुक्त रुप से किया से प्रकाशक पराग कौशिक पराग बुक्स की पुस्तक सोजे वतन का लोकार्पण किया।

सकल साहित्य समाज जनपद मुजफ्फरनगर की ओर से आयोजित किए गए कार्यक्रम में वक्ताओं ने उपस्थित हुए लोगों को पुस्तक के कई अनछुए पहलुओं के बारे में जानकारी दी गई। पराग प्रकाशन के पराग कौशिक ने दावा किया है लेखक मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित सोजे पुस्तक को लेकर समाज में कई भ्रांतियां हैं।

इस पुस्तक के आने से न केवल उन भ्रान्तियों का निवारण होगा बल्कि प्रेमचन्द पर शोध की दिशा भी बदल जाएगी। इस अवसर पर बोलते हुए एस.डी. कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के अधिशासी निदेशक डॉक्टर एसएन चौहान ने प्रश्न उठाया कि यह प्रेमचन्द द्वारा प्रसिद्धि पाने का कोई सस्ता हथकंडा तो नहीं था। इस प्रश्न का उत्तर उत्तर देते हुए मुख्य अतिथि डॉ. मक्खन मुरादाबादी ने उदाहरण दिया कि जिस प्रकार साहित्यिक समाज में किसी के नाम के सामने डॉक्टर की उपाधि लगा देना प्रचलन में आ जाता है और वह व्यक्ति इसका खंडन यह सोचकर नहीं करता है कि सम्मान मिल रहा है तो खंडन करने की क्या आवश्यकता है। ऐसा ही कुछ प्रेमचन्द के साथ भी रहा होगा कि बलिदानियों में गिनती होती है तो हर्ज़ भी क्या है।

डॉ. प्रदीप जैन ने इससे आगे प्रकाश डालते हुए बताया कि सरकारी कर्मचारी होने के नाते प्रेमचन्द पर यह कार्यवाही अवश्य की गई थी कि भविष्य में उनके द्वारा लिखे हुए को जिलाधिकारी द्वारा सेंसर कराया जाएगा। इसके साथ ही प्रेमचन्द ने सोज़े वतन को लेकर अपना माफ़ीनामा भी दिया था। यह माफ़ीनामा यदि साहित्य जगत के प्रकाश में आ गया होता तो प्रेमचन्द के लिए बहुत अपमानजनक होता।

जबकि जब्ती के अफवाह से उन्हें बलिदानी का दर्जा मिल रहा था। संभवतः इसलिए प्रेमचंद ने इस झूठ को न केवल चलने दिया बल्कि अपनी ओर से भी इस की आधी अधूरी पुष्टि ही की। विशिष्ट अतिथि डॉ. लोकेन्द्र त्यागी ने डॉ. प्रदीप जैन से दुष्यंत कुमार, रामेश्वर त्यागी और पदम सिंह शर्मा आदि विख्यात साहित्यकारों पर शोध करने का आवाहन करते हुए उनकी दुर्लभ पांडुलिपियाँ उपलब्ध कराने का वचन भी दिया।

इस अवसर पर अतिथियों के अलावा जे पी सविता, महेन्द्र आचार्य, तरुण गोयल, अ कीर्तिवर्धन, प्रदीप शास्त्री, सुशीला शर्मा, राधामोहन तिवारी, परमेन्द्र सिंह सविता वर्मा गज़ल, विरेश त्यागी, नेमपाल प्रजापति, निहार रंजन सोनू सहित शहर के अनेक साहित्यकार, गणमान्य व्यक्ति और समाजसेवी मुख्य रूप से उपस्थित रहे।

News-Desk

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